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समाज की उपयोगिता का ध्यान रखकर बनाई जाए शोध परियोजना : प्रो. मूर्ति

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इंडियन सिस्टम नॉलेज नई दिल्ली के समन्वयक प्रो. जीएस सूर्यनारायण मूर्ति गंती ने कहा कि प्राचीन काल में भी शोध कार्य ऋ षि मुनियों के द्वारा होता था। आज भी नई शिक्षा नीति के तहत भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों के अंतर्गत शोध कार्य करने पर बल देने आवश्यकता है।
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वह रविवार को संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पाणिनी भवन सभागार में आयोजित तीन दिवसीय शोध परियोजना कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। दूसरे दिन के पंचम सत्र में शोध प्रस्ताव योजना लेखन विषय पर बोलते हुए प्रो. मूर्ति गंती ने कहा कि शोध कार्य के लिए विद्वत समाज और सामान्य जन के मध्य सामंजस्य होना चाहिए। आईकेएस डिवीजन की समन्वयक प्रो. अनुराधा चौधरी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा व उसमें निहित विधाओं का परस्पर समन्वय आवश्यक है। जेएनयू में प्राच्य विद्या संस्थान के संकायाध्यक्ष प्रो. संतोष कुमार शुक्ल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा व आधुनिक ज्ञान परंपरा के समन्वय से नए शोध आयाम तक पहुंचा जा सकता है। मुख्य वक्ता संस्कृत भारती के महासचिव महामहोपाध्याय पद्मश्री चमू कृष्ण शास्त्री ने कहा कि शास्त्रों के अंदर छिपे वैज्ञानिक ज्ञान भंडार को शोध के माध्यम से जनोपयोगी बनाया जाए। इस दौरान प्रो. शैलेष कुमार मिश्र, प्रो. महेंद्र कुमार पांडेय, प्रो. अमित शुक्ल, प्रो. रामपूजन पांडेय, प्रो हरिशंकर पांडेय, प्रो. सुधाकर मिश्र, प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी, प्रो. रमेश प्रसाद, प्रो. हीरक कांति चक्रवर्ती, डॉ. विजय पांडेय, विद्या चंद्रा, डॉ. रविशंकर पान्डेय, डॉ. विजेंद्र आर्य, डॉ. नीतिन आर्य, डॉ. सत्येंद्र यादव व महाविद्यालयों के अध्यापक उपस्थित थे।
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