काशी का टाउन हॉल, कलेक्ट्रेट, थाना चौक-कैंट, वाराणसी जंक्शन, बीएचयू बिड़ला हॉस्टल का जनतंत्र वृक्ष गणतंत्र के जीते-जागते गवाह हैं। बीएचयू का जनतंत्र वृक्ष और देश का गणतंत्र दोनों की उम्र एक बराबर 76 साल ही है। अंग्रेजी हुकूमत की डांस-पार्टी क्लब का चोला उतारकर क्रांतिकारियों और कवियों का मंच बनने वाला टाउन हॉल अब शहरी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। यहां नगर निगम सदन की कार्यवाही और बैठक होती है। क्रांतिकारियों को प्रताड़ित करने वाली चर्चनुमा चौक थाने की पुलिस तो अब बाबा विश्वनाथ के भक्तों के दर्शन-पूजन की व्यवस्था देख रही है। आइए, जानते हैं काशी के उन स्थानों की कहानी जो गणतंत्र को जोड़ते हैं।
सीता-अशोक के साथ बढ़ रहा गणतंत्र
बीएचयू के बिड़ला हॉस्टल में सीता-अशोक का पेड़ गणतंत्र के जन्म का गवाह है। 1950 में दिल्ली में गणतंत्र की घोषणा और बीएचयू में छात्रों और प्रोफेसरों द्वारा सीता-अशोक का पौधा रोपा गया। इसे जनतंत्र का नाम दिया गया। यहां पर शिलापट्ट पर रोपने की तिथि भी लिखवाई गई। हॉस्टल तीन भाग में बंटा, लेकिन जनतंत्र का वृक्ष आज भी डटकर खड़ा है।
टाउन हॉल में शहरी लोकतंत्र की बहस
विजयानगरम साम्राज्य के महाराज ने 19वीं शताब्दी में मैदागिन का प्रसिद्ध टाउन हॉल बनवाया था। अंग्रेजों के डांस और पार्टियों के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता था। यहां पर बड़े-बड़े झूमर लगे थे। बाद में इसका चोला उतारकर कवियों और क्रांतिकारियों का मंच बना। 1905 में गांधी जी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में कांग्रेस का बनारस अधिवेशन हुआ था। पहली बार बीएचयू का प्रस्ताव आया। भारत छोड़ो आंदोलन में यहां पर तीन क्रांतिकारियों की शहादत भी हुई थी। गणतंत्र बनने के बाद इसे बनारस म्यून्सिपाल्टी बोर्ड का नाम दिया गया। अब यहां नगर निगम के सदन की बैठक होने लगी।
थाना चौक... क्रांतिकारियों की जासूसी करने वाली पुलिस अब श्रद्धालुओं को करा रही दर्शन
अंग्रेजों के जमाने का सबसे खतरनाक कोतवाल यहीं पर रहता था। अंग्रेजी पुलिस ने पहली बार चंद्रशेखर आजाद को इसी चौक थाने के पास से गिरफ्तार कर सेंट्रल जेल भेजा गया था। ब्रिटिश चर्च मॉडल के इस चौक थाने पर झंडारोहण कर पंडा समाज और मुस्लिम धर्मावलंबियों ने जमकर गणतंत्र का जश्न मनाया। तब का चौक थाना अंग्रेजी सेना के अधिकार में था और क्रांतिकारियों और श्रद्धालुओं की जासूसी कराता था। उन्हें प्रताड़ित किया जाता था, लेकिन आज यहां की पुलिस विश्वनाथ मंदिर में आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की दर्शन-व्यवस्था देखती है।
अंग्रेजों के जमाने में थी राजाओं की कचहरी
चार लाख की आबादी वाले इस काशी के कलेक्ट्रेट और आज के जिला मुख्यालय पर झंडारोहण किया गया। जौनपुर, गाजीपुर, भदोही और चंदौली इसी बनारस का हिस्सा थे। इसे अंग्रेजों के जमाने में राजाओं की कचहरी कही जाती थी। इसका निर्माण 1820 में किया गया था। आज 203 साल के बाद भी यहां पर न्याय और राजस्व कार्य होता है। अब यहां पर प्रमुख को जिलाधिकारी कहा जाता है। बहरहाल कलेक्ट्रेट के लिए नया भवन भी प्रस्तावित है।
2 प्लेटफॉर्म से अब 11 प्लेटफॉर्म तक
गणतंत्र के गवाह के रूप में वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन भी है, जिसे पहले सिकरौल के नाम से जाना जाता था। 1862 के इस जंक्शन से माल परिवहन के अलावा छोटी लाइन की ट्रेनें चलती थी। अंग्रेजों के जमाने में स्थापित यह स्टेशन 1956 के बाद पंडित कमलापति त्रिपाठी ने इसका कायाकल्प किया। वर्तमान में 11 प्लेटफॉर्म हैं। 112 जोड़ी से अधिक यात्री ट्रेनें कैंट से गुजरती हैं।