उन्होंने कहा कि सिर्फ तस्वीरों को देखकर कुछ अधिकृत रूप से नहीं कहा जा सकता। यदि ऐसा है तो इसका पहले भौतिक सत्यापन होना चाहिए और फिर भूगर्भ वेत्ता इसकी आयु का निर्धारण करेंगे। उसके बाद ही कुछ कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा है तो जल्द ही इसे यहां से उठाकर सुरक्षित पुरातत्व विभाग के सोनभद्र के शिवद्वार स्थित संग्रहालय में रखा जाना चाहिए।
असुरक्षित हैं जीवाश्म
हालांकि शोर- शराबा तो बहुत हुआ लेकिन उसके बाद मामला ठंडा पड़ गया। एक वर्ष बाद भी क्षेत्र में मिले फ़ासिल्स जीवाश्म की सुरक्षा न के बराबर है। आसपास के लोग जीविकोपार्जन के लिए उन पत्थरों को तोड़कर पुरानी धरोहरों को मिटाने में लगे हुए हैं। शासन प्रशासन की ओर से भी इसे संरक्षित करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
इन पहाड़ियों में उगते हुए सूरज, चांद, गाय के खुर का चित्र आज भी देखे जा सकते हैं। इन्हें लोग तोड़कर जमीन कब्जा करने में लगे हुए हैं। जागरूक लोगों ने मांग की है कि इसको उठाकर सुरक्षित म्यूजियम में रखवाया जाए ताकि इस पर अध्ययन किया जा सके।