काशी में बुधवार की सुबह भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर विराजित होकर प्रभु जगन्नाथ शहर के सैर सपाटे पर निकले। इसी के साथ ही भगवान और भक्तों के प्रेम का अनूठा रिश्ता आस्था के मेले में सड़क की पटरियों पर रच बस गया। काशी का यह लक्खा मेला बारिश की फुहारों के साथ भक्ति भाव के रंग से सराबोर हुआ। करीब 235 साल पुराना यह रथयात्रा मेला अपने आप में कई परंपराओं को समेटे हुए है।
भोर में प्रभु जगन्नाथ की भव्य आरती और पूजा पाठ के बाद यह तीन दिवसीय मेला गुलजार हो उठा। एक ओर रथ का स्पर्श करने और प्रभु जगन्नाथ के चरणों में तुलसी दल अर्पित करने की होड़ मची तो दूसरी ओर प्रभु के ससुराल में अगवानी और खातिरदारी की तैयारियां भी शुरू हो र्गइं। दिन भर बारिश की फुहारों के बीच मेले में आस्था और उल्लास के रंग बरसे। शाम होते ही प्रभु जगन्नाथ की एक झलक पाने को भक्त बेताब दिखे।
निराला निवेश से रथयात्रा चौराहे के बीच बच्चों व युवतियों की भीड़ खुशियां बांटती रही। मेले में सजावटी सामानों, मूर्तियों के साथ ही खिलौनों की दूकानें खरीदारों से गुलजार हो गईं। फूलों के रंग बिरंगे लतर से सजे रथ के दर्शन के लिए लोग पूरी रात घरों से निकलते रहे। मेले में बच्चों से लेकर बड़े तक झूले, चरखे, गुब्बारों के साथ लजीज व्यंजनों का लुत्फ उठाते रहे। हालांकि इस साल नान खटाई की दूकानें कम दिखीं। पहले महमूरगंज से लक्सा तक सड़क के दोनों ओर नान खटाई की दूकानें सजती थीं।