फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कोविड प्रोटोकॉल के अनुसार हुई तरावीह की नमाज

विज्ञापन
विज्ञापन
मगफिरत के अशरे में रोजेदार खुदा से गुनाहों की माफी मांग रहे हैं। रब के इस महीने में कोरोना आपदा के खात्मे की भी दुआएं की जा रही हैं। सहरी और इफ्तार की सुन्नतों के साथ ही तरावीह का सिलसिला जारी है।
विज्ञापन

शनिवार को कोरोना कर्फ्यू के कारण मस्जिदों में कोविड प्रोटोकॉल के अनुसार तरावीह की नमाज अदा की गई। हाजी ओकास अंसारी ने बताया कि यह रब का महीना है। रब तो यहां तक कहता है कि मांगो न दूं तो कहना। मगर हम कितने बदनसीब हैं कि हमें मांगना ही नहीं आता। हम रमजान का रोजा रख रहे हैं मगर हम मांग नहीं पा रहे हैं कि मौला कोरोना की आपदा दूर कर दें। इस्लाम कह रहा है कि पता करो कोई पड़ोस में भूखा तो नहीं हैं, अगर कोई तुम्हारे पड़ोस में भूखा है उसके घर पर इफ्तारी का सामान नहीं है तो उसकी भूख मिटाना, उसे इफ्तारी का सामान मुहैया कराना तुम्हारी जिम्मेदारी है। मगर हम पहले अपना पेट भरने के चक्कर में अपनी जिम्मेदारी भूलते जा रहे हैं।
इस्लाम ने अगर पड़ोसी का अधिकार दिया है तो जकात का सिस्टम भी बनाया है ताकि हर साहिबे निसाब अपने दौलत और जमा कमाई का शरीयत कि ओर से तय मानक ढाई फीसद के हिसाब से गरीबो को जकात दे दें ताकि वो भी रमजान और ईद कि खुशियां मना सकें। मगर जब पूरा रमजान जाने लगेगा तब जकात निकाली जाएगी तो किसी का क्या भला होगा। इस्लाम यह भी कह रहा है कि एक हाथ से दो तो दूसरे को पता न चले कि क्या दिया और किसे दिया, कितना दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन

7355546032
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें