उलेमा मौलाना डॉ. शफीक अजमल का कहना है कि ईद का मतलब केवल यह नहीं कि महीने भर जो इबादत करके नेकियों की पूंजी एकत्र किया है उसे बुरे और बेहूदा कामों में जाया कर देना बल्कि ईद का मतलब है कि दूसरों को खुशियां बांटना।
मौलाना शफी अहमद कहते हैं कि दूसरों की मदद करना ईद का सबसे बड़ा मकसद है। मौलाना अजहरुल कादरी ने ईद की तवारीखी हैसियत पर रौशनी डालते हुए बताया कि सन दो हिजरी में सबसे पहले ईद मनायी गई। पैगंबरे इस्लाम नबी ए करीम हजरत मोहम्मद का वो दौर था।
ईद के चांद की तस्दीक होते ही मुस्लिम इलाकों की रौनक देखने लायक थी। आतिशबाजी के साथ ही मुबारक हो की सदाएं भी फिजां में गूंजी। रोजेदारों ने कोरोना के खात्मे के साथ ही मुल्क में अमन चैन की दुआएं मांगी और ईद की तैयारियां शुरू हो गईं।
बृहस्पतिवार की शाम को रोजा खोलने के बाद लोग छतों पर ईद के चांद के दीदार को जा खड़े हुए। कुछ मस्जिदों तो कुछ ऊंची इमारतों पर जा डटे लेकिन बदली ने चांद देखने में खलल डाला। फिर भी लोग कोशिश में लगे रहे। इस बीच पटाखे बजने लगे तो लोग खुश हो गए। लेकिन चांद कमेटी की तस्दीक जरूरी थी। लिहाजा लोग इंतजार में रहे।
इशा बाद इज्तेमाई रुइयते हेलाल कमेटी के ऐलान पर लोग ईद की खुशी में झूम उठे। बजरडीहा, सरैया, अलईपुर, पीलीकोठी, छितनपुरा, शिवाला, गौरीगंज, मदनपुरा, दालमंडी, नई सड़क, नदेसर, अर्दली बाजार में खुशी का माहौल रहा। कोरोना संक्रमण के कारण लोगों ने घरों में ही एक दूसरे को मुबारकबाद दी।
ईद का चांद दिखते ही जहां लोगों ने एक-दूसरे को ईद की बधाई दी वहीं मोबाइल पर भी बधाई के काल और एसएमएस आने लगे। रोजेदारों ने रोजा खोला और नमाज अदा कर ज्योंही चांद का दीदार किया कि उसके बाद उनके मोबाइल पर बधाई की कालें और एसएमएस आने शुरू हो गए। लोगों ने रिप्लाई कर उन्हें भी बधाई दी और शुक्रिया अदा किया। महिलाओं ने ईद की तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया था। कोई खोआ भून रहा था तो कोई सेंवई बनाने की तैयारी में जुटा रहा।
रमजान के आखिरी अशरे में मस्जिदों में एतकाफ पर बैठने वाले लोग चांद का दीदार कर बृहस्पतिवार की शाम को अपने-अपने घरों को रवाना हुए। मस्जिद में मौजूद लोगों ने उन्हें रुखसत किया। घर पहुंचने पर परिवार वालों ने उनका स्वागत किया और मुसाहफा कर उनका हाथ चूमा।