कामेश्वर, हमें त यार बनारस क दुईय चीज ह प्यारी। एक ठे समधियाने क मीठ-मीठ गारी अ दूसर ससुराल क खातिरदारी। इतना कहते ही पं. कामेश्वर नाथ मिश्र की आंखें झलक उठीं। बिलखते हुए कामेश्वर मिश्र ने कहा कि अब उ अलमस्त अंदाज भला उ कहां देखाई। चल गयल एही मोहल्ले क ठसकदार समधी, एही बस्ती क लजाधुर जवांई। सिसकने के बाद पं. कामेश्वर मिश्र फफक उठे।
कबीरचौरा में कथक सम्राट के निधन की खबर पहुंचते ही पद्मगली में शोक की लहर दौड़ गई। शोकाकुल कामेश्वर मिश्र ने बताया कि उन्हें आज भी याद है कि वह दिन जब बिरजू महाराज के चाचा पं. शंभु महाराज अपने भतीजे की बरात लेकर आए थे। पिपलानी कटरा में जनवासा बनाया गया था। बहुत रौनक थी। जब भी बिरजू महाराज से मुलाकात होती तो वह खूब चुटकी लेते थे।
का बनारस का लखनऊ! अवध क बिरजू महाराज अ काशी क पं. रामसहाय जी क पुरखा त एके रहलन न बचऊ। महाराज जी जिंदगी भर इ आन निबहलन काशी के घरौंदा अ लखनऊ के घराना मनलन। पं. बिरजू महाराज का विवाह बनारस संगीत घराने के सलाका पुरुष पं. श्रीचंद्र मिश्र की पुत्री अन्नपूर्णा से हुआ था, जबकि सारंगी वादक पं. हनुमान मिश्र उनके समधी थे। हनुमान मिश्र के छोटे बेटे पद्मभूषण साजन मिश्र का विवाह बिरजू महाराज की पुत्री कविता से हुआ था।