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सत्ता के गलियारों में थम गए पूनम के पांव

Wed, 19 Oct 2016 02:03 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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पूनम (फाइल फाोटाो)
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डेंगू के डंक ने तो पूनम चौहान को बाद में मारा। उपेक्षा और बेकदरी के अलावा एक अदद नौकरी न मिलने का दंश उसे पहले ही मार चुका था। अपने बेहतरीन फुटवर्क के चलते विरोधियों को चौंकाने वाली पूनम के वही करामाती पांव अपनी अर्जी ढोते-ढोते सत्ता के संवदेनहीन गलियारे में बेदम हो गए पर उसे कहीं से मदद नहीं मिली।
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पूनम सात बार यूपी सीनियर फुटबाल टीम का हिस्सा रही, जबकि दो बार कप्तानी भी की। इसके अलावा वह पांच बार से ज्यादा बार जूनियर फुटबाल टीम की सदस्य रही थी। अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी के तौर पर उसने कई पदक भी जीते लेकिन इन उपलब्धियों के बाद भी उसे नौकरी नहीं मिल पाई। केवल नौकरी का आश्वासन मिलता रहा। पूनम चौहान सीएम से पीएम तक नौकरी की गुहार लगाती रही। हालांकि हाल ही में शहर उत्तरी के भाजपा विधायक रवींद्र जायसवाल ने 24 अक्तूबर को वाराणसी आ रहे पीएम नरेंद्र मोदी से मिलवाने की बात कही तो उसकी उम्मीद बढ़ गई लेकिन उसकी यह हसरत पूरी नहीं हो पाई और उसने जिंदगी को अलविदा कह दिया।


तीन बहन और दो भाइयों में सबसे बड़ी पूनम का जन्म 13 जून, 1987 को हुआ था। उसके परिवार में मां के अलावा पूरा परिवार खेलों से जुड़ा है। पिता मुन्ना चौहान जिला स्तर के फुटबाल खिलाड़ी रहे हैं तो दो बहनों में से एक अंतरराष्ट्रीय और एक बहन और एक भाई राष्ट्रीय स्तर की फुटबालर हैं।
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दूसरा भाई प्रशांत चौहान राष्ट्रीय स्तर का हाकी खिलाड़ी है। 2006 में भारतीय टीम में अंडर-19 और 2010 में सीनियर टीम का हिस्सा बनकर पहले बांग्लादेश और बाद में मलयेशिया में उम्दा प्रदर्शन कर गोल्ड मेडल हासिल किया। इसके साथ ही पूनम गोल्ड मेडल पाने वाली यूपी की पहली महिला फुटबालर बन गई थी।


बास्केटबाल में सिंह सिस्टर्स की तरह फुटबाल में चौहान सिस्टर्स के नाम से प्रसिद्ध तीनों बहनों की तिकड़ी देश के लिए मिसाल थी। मंगलवार को चौहान सिस्टर्स की सबसे मजबूत कड़ी (पूनम चौहान) टूट गई। हर कोई इस होनहार कड़ी की उपलब्धियाें को याद करते हुए सरकार को कोस रहा था।
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