ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया। कुछ ऐसा ही हाल गंगा का भी हो गया है। घाटों को छोड़ चुकी गंगा अब आचमन के लायक भी नहीं रह गई हैं। गंगा में प्रदूषण की बात करें तो प्रवाह बंद होने के कारण अस्सी से लेकर आदिकेशव घाट तक लिए गए जल के नमूनों की जांच के परिणाम बेहद चौंकाने वाले आए हैं।
डिजाल्व ऑक्सीजन की मात्रा वरुणा संगम पर खतरनाक स्तर तक कम होने के कारण जलचरों के जीवन पर भी संकट खड़ा हो गया है। साथ ही गंगा में डुबकी लगाने वाले भी पानी से आने वाली बदबू से परेशान और चिंतित हैं।
गंगा में पानी कम होने के साथ ही प्रदूषण का स्तर खतरनाक ढंग से बढ़ रहा है। कुछ साल पहले गंगा में घुलनशील ऑक्सीजन का स्तर पांच या छह मिलीग्राम प्रति लीटर होता था लेकिन अस्सी घाट पर यह स्थिति एक मिलीग्राम और आदिकेशव घाट पर घुलनशील ऑक्सीजन की स्थिति शून्य तक पहुंच गई है।
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संकटमोचन फाउंडेशन की ओर से 12 फरवरी को शाम छह बजे तुलसी घाट पर की गई गंगाजल की जांच में यहां घुलनशील आक्सीजन की मात्रा 1.8 मिलीग्राम प्रति लीटर पाई गई थी। कुछ महीने पहले यह स्तर पांच मिलीग्राम प्रति लीटर था। आंकड़े बताते हैं कि गंगा में रोजाना 350 एमएलडी सीवेज गिराया जा रहा है।
अस्सी घाट पर अस्सी नाला और वरुणा संगम पर सीवेज लगातार गिर रहा है। पहले गंगा में प्रवाह के कारण मलजल घुल जाता था लेकिन पानी और प्रवाह कम होने के कारण सीवेज घुल नहीं पा रहा है।
अस्सी घाट पर रहने वाले संजू गिरी, कमलेश मांझी और संजय कुशवाहा ने बताया कि अब गंगा में डुबकी लगाने पर बदबू भी आती है। इसी तरह गंगा में फीकल कॉलीफार्म 500 के अंदर होना चाहिए लेकिन तुलसी घाट पर यह आंकड़ा 70 हजार और दशाश्वमेध घाट पर 50 हजार पहुंच गया है।
उधर, वरुणा संगम पर स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां फीकल कॉलीफार्म की स्थिति तो छह करोड़ के पास पहुंच चुकी है। गंगा के बीओडी लेवल की तो आदर्श स्थिति तीन मिलीग्राम प्रति लीटर की है, जबकि तुलसी घाट पर सात मिलीग्राम, दशाश्वमेध घाट पर छह मिलीग्राम और वरुणा के संगम पर 45 मिलीग्राम के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। बीओडी का खतरनाक स्तर बताता है कि गंगा में आर्गेनिक लोड कितना है।