रहूंगा यहीं
किसी किवाड़ पर
हाथ के निशान की तरह पड़ा रहूंगा।
किसी पुराने ताखे या संदूक की गंध में छिपा रहूंगा मैं
दबा रहूंगा किसी रजिस्टर में अपने स्थायी पते के अक्षरों के नीचे...।
मशहूर कवि और जाने-माने साहित्यकार डॉ. केदारनाथ सिंह की यह पंक्तियां जमीन से उनके जुड़ाव को बताने के लिए पर्याप्त हैं। डॉ. सिंह का काशी से बहुत गहरा जुड़ाव रहा है। उन्होंने बीएचयू के हिंदी विभाग से स्नातकोत्तर करने के बाद शोध छात्र के रुप में अध्ययन किया था।
बाद में उदय प्रताप इंटर कॉलेज में शिक्षक के रुप में भी जिम्मेेदारियों का निर्वहन किया है। अपनी साहित्यिक कृतियों में उन्होंने बनारस का खूब उल्लेख किया है। काशी से डॉ. सिंह के जुड़ाव का अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि जब उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा के बाद उन्होंने कहा था-मैं तो काशी वाला हूं, काशी ने बहुत कुछ दिया है। यह मेरा नहीं, काशी का सम्मान है। अत: कृतज्ञ होकर यह सम्मान स्वीकार करता हूं।
बनारस के साहित्यकारों, कवियों, शिक्षकों को उनका जाना बहुत खल रहा है। उनके निधन की खबर मिली हर कोई स्तब्ध रह गया। उनके जाने से काशी के साहित्य जगत में सूनापन आ गया है। बलिया में जन्म के बाद प्रारंभिक शिक्षा अर्जित करने के बाद वह उदय प्रताप इंटर कॉलेज में अध्यापन करने के बाद यहीं शिक्षक के रुप में भी रहे।
बीएचयू में 1969 में जब प्रवक्ता के रुप में उनकी नियुक्ति हुई तो वह उसे ठुकरा कर जेएनयू, दिल्ली चले गए। इसके बाद हिंदी विभाग में आयोजित कार्यक्रमों में जब भी उन्हें बुलाया जाता था, आमंत्रण को सहज भाव से स्वीकार करते थे।
डॉ. सिंह के बलिया जिले में स्थित गांव चकिया में एक मकान जरूर है लेकिन वहां कोई नहीं रहता है। कई साल पहले परिवार कोलकाता जाकर बस गया है। परिवार में एक पुत्र और पांच पुत्रियां हैं। 2013 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के बाद वह बलिया आए थे। इस दौरान उन्हें कई स्थानों पर सम्मानित किया गया था।
जीवन परिचय
1934: बलिया के चकिया गांव में जन्म और प्रारंभिक शिक्षा
1952: उदय प्रताप इंटर कॉलेज से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण
1956: बीएचयू के हिंदी विभाग से स्नातकोत्तर
1964: बीएचयू के हिंदी विभाग से पीएचडी