केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान सारनाथ की कुलसचिव डॉ. सुनीता चंद्रा ने बताया कि 37.95 करोड़ की लागत से जी प्लस 4 मंजिल के निर्माण का सिविल कार्य लगभग पूरा हो चुका है। इसके लिए 33 केवीए विद्युत आपूर्ति फीडर, मेडिकल उपकरण, फर्नीचर समेत अन्य आतंरिक काम बाकी हैं। इसे जल्द ही पूरा कराया जाएगा।
प्रथम चरण में 40 बेड के साथ अस्पताल शुरू करना प्रस्तावित है। इसमें ऑपरेशन थियेटर, ओपीडी, वार्ड, मोर्चरी, 500 लोगों की क्षमता के ऑडिटोरियम, पार्किंग की सुविधा होगी। कुल सचिव ने बताया कि संस्था में अभी छोटा हर्बल गार्डन है। सोवा रिग्पा पद्धति से इलाज के लिए संस्था औषधियां भी खुद बनाती है। वाराणसी में भी आगे चलकर हर्बल गार्डन बनाने की संभावना है। इससे रोजगार भी उपलब्ध होगा।
मरीजों की सुविधा के लिए अस्पताल में हेलिपैड प्रस्तावित है। सेमिनार, टीचिंग, रिसर्च और मरीजों का इलाज एक साथ करने वाला देश का यह बड़ा सेंटर होगा। ओपीडी, छह कंसल्टेंट रूम (ज्योतिष कंसल्टेंट भी होंगे), एक बड़ा वेटिंग हॉल ,अत्याधुनिक इमरजेंसी, इंटेंसिव केयर यूनिट, ऑपरेशन थियेटर, इंडोर पेशेंट, थेरेपी, फार्मेसी, क्लास रूम, लाइब्रेरी, म्यूजियम, लैब और नक्षत्र शाला होगी।
रिग्पा चिकित्सा पद्धति का इतिहास और महत्व
केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के सोवा रिग्पा विभाग के विभागाध्यक्ष तासी दावा ने बताया कि सोवा रिग्पा मूलतः तिब्बत में ही विकसित हुआ है। जो दुनिया की पुरानी और प्रमाणित चिकित्सा पद्धति है। सातवीं से आठवीं शताब्दी के समय में ये विद्या और गहरी हो गई थी। इसमें ग्रीक, भारत, चीन, तिब्बत समेत कई देशों के चिकित्सक विद्वान शामिल हुए थे। तिब्बती चिकित्सा पद्धति चीन के कई प्रांतों, मंगोलिया, रूस, नेपाल, भारत समेत कई देशों तक फैली है।