धान की अधिक उपज देने वाली किस्मों को विकसित करने के लिए वाराणसी में अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान केंद्र का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उद्घाटन करेंगे। उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने बुधवार को कलेक्टरी फार्म स्थित कृषि शोध केंद्र का निरीक्षण किया। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि शोध केंद्र पर सिंचाई के लिए ट्यूबवेल की व्यवस्था कराई जाए। साथ ही किसान कल्याण केंद्र के लिए जमीन तलाशने को कहा। निरीक्षण के बाद पत्रकारों से कृषि मंत्री ने कहा, चावल अनुसंधान केंद्र का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उद्घाटन करेंगे। दिसंबर महीने में इसको शुरू कराने का प्रयास किया जा रहा है। इससे पहले विभागीय समीक्षा में कृषि मंत्री ने बीज, खाद सहित किसानों से जुड़ी अन्य उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करने को कहा।
निरीक्षण के दौरान कृषि मंत्री ने कहा कि केंद्र पर कम पानी में धान पैदा होने का बीज विकसित किया जाएगा। उन्होंने वेधशाला में वाष्प मापी, वर्षा मापी आदि संयंत्रों को देखा और गंदगी मिलने पर नाराजगी जताई। उपनिदेशक कृषि राजीव कुमार को परिसर को फूलों के पौधे लगाने को कहा।
उन्होंने कहा कि ज्यादा पैदावार बढ़ाने के लिए बीज रोपण संग सिंचाई के तकनीकी में नए प्रयोग किए जा रहे हैं। शोध सफल हुआ तो काला चावल समेत मोटे अनाजों की पैदावार बेहतर होगी। शुगर की कम मात्रा वाले चावल के बीज का वितरण किसानों में किया जाएगा। निर्देश दिया कि सोलर पंप सहित अन्य योजनाओं के लिए किसानों का पंजीकरण करें। पहले ड्राफ्ट देने वाले किसानों को सब्सिडी वाले सोलर पंप दिए जाएंगे। किसानों को जागरूक करने के लिए पूरे प्रदेश में किसान पाठशाला का आयोजन किया जाएगा।
'धान के कटोरे’ में चावल उत्पादन का उफान
काशी में चावल अनुसंधान के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थान खोलने को प्रधानमंत्री के 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए किए जा रहे उपायों के तौर पर भी देखा जा रहा है। चावल के जरिए पूर्वांचल में धान की नई प्रजातियों का विकास किया जाएगा। धान की उत्पादकता को बढ़ाया जाएगा।
इस दिशा में पहले से ही काम कर रहे काशी हिंदू विश्वविद्यालय का कृषि विज्ञान संस्थान इसमें मददगार होगा। राष्ट्रीय बीज अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र इस क्षेत्र में किए जाने वाले शोध को प्रशिक्षण और प्रदर्शन के माध्यम से किसानों के खेतों तक पहुंचाएगा। कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि पूर्वांचल की भूमि में उत्पादक क्षमता सर्वाधिक है। श्रम भी उपलब्ध है तो यह यहां की अर्थव्यवस्था को खासा प्रभावित कर सकता है।
'धान के कटोरे’ में चावल उत्पादन के उफान आने की संभावना है। सूबे में तराई के बाद पूर्वांचल और इसमें खासकर चंदौली, मिर्जापुर और सोनभद्र जिलों में सबसे अधिक पैदावार होती है। मगर सुगंध, आकार, स्वाद और प्रति हेक्टेअर उत्पादन क्षमता को लेकर कुछ पीछे रह जाता है। इसीलिए किसानों को न तो यहां ही बेहतर दाम मिल पाता है न ही देश की अन्य मंडियों में जा पाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वाराणसी को अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान दिए जाने से धान की नई प्रजातियों के विकास के साथ किसानों की समृद्धि के सभी द्वारा खुल सकते हैं।
वाराणसी से दूसरी हरित क्रांति की शुरुआत संभव है लेकिन फसलों की जरूरत को लेकर जागरूकता की कमी के कारण किसान नए प्रयोग करने से डरते हैं। नतीजतन, दक्षिण भारत के मुकाबले औसत उत्पादकता यहां काफी कम है। यही नहीं, तमाम शोध अभी कृषि विज्ञानियों की प्रयोगशाला से निकल कर जमीन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। वाराणसी, आजमगढ़ और गाजीपुर में कृषि विज्ञान केंद्रों की संख्या बढ़ाकर दो-दो करने के बाद इसमें तेजी आने की उम्मीद है।... और उस पर काशी में चावल अनुसंधान के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थान इसमें चार चांद लगा सकता है।