जीवनभर किया गंगाजल का सेवन
राधेश्याम खेमका बचपन से ही धार्मिक विचार के थे। बचपन से ही वे अपने पिता के साथ माघ मेले में काशी में पूरे एक महीने का कल्पवास रखते थे। पिछले कई दशकों से वे सिर्फ गंगा जल ही पीते थे। कहीं यात्रा में भी जाना हुआ तो वे आवश्यकतानुसार गंगाजल लेकर ही चलते थे। वे धर्म सम्राट स्वामी कृपात्री महाराज के कृपा पात्र थे।
ऐसे हुई कल्याण की शुरुआत
लालमणि तिवारी ने बताया कि दिल्ली में अप्रैल 1926 में आयोजित मारवाड़ी अग्रवाल सभा के आठवें अधिवेशन में घनश्यामदास बिड़ला ने एक पत्रिका निकालने की सलाह दी। गीताप्रेस के संस्थापक सेठजी जयदयाल गोयनका की सहमति से 22 अप्रैल 1926 को पत्रिका का नाम कल्याण निश्चित हुआ। इसी वर्ष भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार के संपादकत्व में कल्याण का प्रथम साधारण अंक मुंबई से प्रकाशित हुआ। दूसरे वर्ष कल्याण का प्रथम विशेषांक भगवन्नामांक गोरखपुर से प्रकाशित हुआ।
संत समाज ने जताया शोक
शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि धर्म का प्रकाश घर-घर तक पहुंचाने वाला दीपक शांत हो गया। राधेध्याम खेमका के निधन से समाज की अपूरणीय क्षति हुई है। भगवान उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
राधेश्याम खेमका की मृदुल वाणी एवं सारगर्भित प्रवचन सनातन धर्मावलंबियों के लिए एक मार्गदर्शक का कार्य करती रही है। वह विचार से मनीषी, आचार से तपस्वी, कर्मों से धर्मनिष्ठï और जीवन निष्ठïा में वैरागी थे। - शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती
सनातन धर्म केप्रति समर्पण और धर्मग्रंथों के माध्यम से समाज व धर्म की सेवा की जो अविरल धारा उन्होंने बहाई थी, वह चिरकाल तक उनको सभी के मन में जीवित रखेगी। -
संतोष दास, महामंडलेश्वर
प्रभु के श्रीचरणों में परमपद पाने के लिए महाप्रयाण के बाद भी उनके कृत्य, धार्मिक निष्ठा, सनातनी समर्पण, गो-सेवा, संस्कृत उन्नयन के कार्य से वह सदैव सभी के दिलों में जीवित रहेंगे।-
महंत बालक दास, पातालपुरी मठ
सनातन धर्म का गूढ़ और प्रामाणिक ज्ञान गीता प्रेस की पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने घर-घर तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। उनकेसंपादन में प्रकाशित होने वाली पुस्तकें हर सनातन धर्मी को सीख देती है। -
साध्वी गीतांबा तीर्थ, देवी उपासिका