वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्ग
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केस-1
70 वर्षीय शेफाली, जनवरी से राजकीय वृद्धाश्रम में रह रही हैं। उनके चार बेटे-बहू, नाती-पोते सभी हैं, लेकिन वह अपने अंतिम समय में आश्रम में वनवास काट रही हैं। बताती हैं कि पिछले नौ महीनों में घर से कोई उनकी सुध लेने नहीं आया, न ही कभी किसी ने फोन किया। जबकि उनका घर दशाश्वमेध इलाके में है।
केस-2
72 वर्षीय लीलावती पांडेय, पिछले तीन वर्षों से वृद्धाश्रम में रह रही हैं। सकलडीहा की रहने वाली लीलावती ने अपनी दोनों बेटियों की शादी अच्छे घरों में कर दी। बेटे नहीं थे। पति के स्वर्गवास के बाद पाटीदारों ने उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उन्होंने खुद को बेसहारा मानते हुए वृद्धाश्रम में आकर शरण ले ली। बताती हैं कि पहले बेटी कभी-कभी फोन कर लेती थी, सप्ताह में एक-दो बार मिलने भी आती थी। लेकिन बीते छह महीनों से न कोई फोन आया और न ही कोई मिलने आया।
केस-3
रामकिशुन प्रसाद (81 वर्ष), भेलूपुर क्षेत्र के निवासी अपना घर आश्रम में अपना अंतिम समय बिता रहे हैं। याद्दाश्त इतनी तेज़ है कि 40 साल पुरानी बातें भी साफ याद हैं। उनका बेटा रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरी करता है। एक वर्ष पहले मिलने आया था, लेकिन तब से नहीं आया। रामकिशुन बताते हैं कि उन्होंने एक बार अपने बेटे से 400 रुपये लिए थे। वे कहते हैं, “पुत्र ऋण न हो, इसलिए वह पैसा सहेज कर रखा है कि जब बेटा आए, तो उसे लौटा सकूं।”
क्या बोले अधिकारी
एक ओर तो लोग दान कर रहे हैं, दूसरी ओर अपने घर के बुजुर्गों को आश्रम में छोड़ दे रहे हैं। नई पीढ़ी की समस्या यही है कि वह रिश्तों की अहमियत नहीं समझ रही है। उसे नैतिक मूल्यों और रिश्तों की गरिमा को समझाने की आवश्यकता है। -देवशरण सिंह, अधीक्षक, राजकीय वृद्धाश्रम