फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Pitru Paksha: पितृऋण से कैसे होंगे मुक्त, बेटे-बेटी ही बुजुर्गों से मोड़ रहे मुंह, वृद्धाश्रम में काट रहे दिन

Sun, 21 Sep 2025 10:04 AM IST
प्रगति चंद अभिषेक सेठ, संवाद न्यूज एजेंसी, वाराणसी।

सार

Pitru Paksha 2025 : एक तरफ पितृपक्ष में देश- विदेश से लोग काशी में पितरों का तर्पण करने के लिए पहुंच रहे हैं। वहीं जिले के वृद्धाश्रम में अपने बेटे- बेटी ही बुजुर्गों को छोड़कर जा रहे हैं। 
विज्ञापन
अपना घर आश्रम में रह रहे बुजुर्ग - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

पितृपक्ष में दान-पुण्य के लिए वृद्धाश्रमों में लोगों की भीड़ उमड़ रही है। जिले के दो बड़े वृद्धाश्रम दुर्गाकुंड स्थित राजकीय वृद्धाश्रम और सामने घाट स्थित अपना घर आश्रम में इस समय दानदाताओं की सूची दोगुनी हो गई है। लोग अपने पितरों के तर्पण के लिए यहां दान करने की भावना से पहुंच रहे हैं।

विज्ञापन


इसके अलावा, इन वृद्धाश्रमों में बड़ी संख्या में ऐसे भी बुजुर्ग रह रहे हैं, जिन्हें उनके परिजनों ने यहां छोड़ दिया और फिर उनसे नाता तोड़ लिया। बेटे-बहू, बेटी-दामाद, भाई-बहन व अन्य रिश्तेदारों ने इन्हें आश्रम में भर्ती करने के बाद कभी इनकी सुध नहीं ली। इतना ही नहीं, जब आश्रम प्रबंधन ने परिजनों से संपर्क साधने की कोशिश की, तो उन्होंने इन बुजुर्गों को वापस लेने से साफ इंकार कर दिया।

अपना घर आश्रम के संचालक डॉ. के. निरंजन बताते हैं कि उनके यहां तकरीबन 400 बुजुर्गों में से 250 ऐसे हैं, जिनके परिजन अब उन्हें रखना ही नहीं चाहते। इनमें 10 बुजुर्ग ऐसे हैं, जिनकी उम्र अब ढल चुकी है और वे अपने जीवन का अंतिम समय यहां बिता रहे हैं। ऐसे में उन्हें स्थायी रूप से आश्रम में ही जगह दे दी गई है। राजकीय वृद्धाश्रम के अधीक्षक देवशरण सिंह के अनुसार, उनके यहां रह रहीं 20 बुजुर्ग महिलाओं में से 10 ऐसी हैं, जिन्हें उनके अपनों ने ही जीवन का वनवास दे दिया है। परिजनों ने कभी उनकी कोई खबर तक नहीं ली।
विज्ञापन


इसे भी पढ़ें; रामनगर की रामलीला: सिर पर खडाऊं लेकर भरत चले अयोध्या, भक्ति देख आनंदित हो गए सभी लोग

विज्ञापन

वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्ग - फोटो : अमर उजाला
केस-1
70 वर्षीय शेफाली, जनवरी से राजकीय वृद्धाश्रम में रह रही हैं। उनके चार बेटे-बहू, नाती-पोते सभी हैं, लेकिन वह अपने अंतिम समय में आश्रम में वनवास काट रही हैं। बताती हैं कि पिछले नौ महीनों में घर से कोई उनकी सुध लेने नहीं आया, न ही कभी किसी ने फोन किया। जबकि उनका घर दशाश्वमेध इलाके में है।

केस-2
72 वर्षीय लीलावती पांडेय, पिछले तीन वर्षों से वृद्धाश्रम में रह रही हैं। सकलडीहा की रहने वाली लीलावती ने अपनी दोनों बेटियों की शादी अच्छे घरों में कर दी। बेटे नहीं थे। पति के स्वर्गवास के बाद पाटीदारों ने उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उन्होंने खुद को बेसहारा मानते हुए वृद्धाश्रम में आकर शरण ले ली। बताती हैं कि पहले बेटी कभी-कभी फोन कर लेती थी, सप्ताह में एक-दो बार मिलने भी आती थी। लेकिन बीते छह महीनों से न कोई फोन आया और न ही कोई मिलने आया।

केस-3
रामकिशुन प्रसाद (81 वर्ष), भेलूपुर क्षेत्र के निवासी अपना घर आश्रम में अपना अंतिम समय बिता रहे हैं। याद्दाश्त इतनी तेज़ है कि 40 साल पुरानी बातें भी साफ याद हैं। उनका बेटा रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरी करता है। एक वर्ष पहले मिलने आया था, लेकिन तब से नहीं आया। रामकिशुन बताते हैं कि उन्होंने एक बार अपने बेटे से 400 रुपये लिए थे। वे कहते हैं, “पुत्र ऋण न हो, इसलिए वह पैसा सहेज कर रखा है कि जब बेटा आए, तो उसे लौटा सकूं।”

क्या बोले अधिकारी
एक ओर तो लोग दान कर रहे हैं, दूसरी ओर अपने घर के बुजुर्गों को आश्रम में छोड़ दे रहे हैं। नई पीढ़ी की समस्या यही है कि वह रिश्तों की अहमियत नहीं समझ रही है। उसे नैतिक मूल्यों और रिश्तों की गरिमा को समझाने की आवश्यकता है। -देवशरण सिंह, अधीक्षक, राजकीय वृद्धाश्रम

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें