संस्था की ओर से कार्यक्रम का आयोजन अंतिम प्रणाम के तहत हुआ। इस आयोजन में समाज के अलग अलग वर्ग के लोग न सिर्फ साक्षी बने बल्कि उन्होंने मृतक बच्चियों को पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित की।
अजन्मी बेटियों के मोक्ष के लिए किया श्राद्ध
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डॉ. संतोष ने बताया कि 2001 में वह आगमन टीम के साथ एड्स के खिलाफ जनजागरूकता अभियान चला रहे थे। इसी दौरान एक ऐसे व्यक्ति से मुलाकात हुई जिसने बेटे की चाह में अपनी पत्नी के गर्भ में ही अपनी बेटी की हत्या कर दी थी। इसके बाद यह घटना मेरे दिमाग में चलती रही और 10 साल पहले मन में विचार आया कि जब पेट में पल रही बेटियों को किन्हीं कारणों से बचाने में सफल नहीं हो पाया तो कम से कम उनके मोक्ष के लिए कामना तो की जा सकती है।
इसके साथ ही बेटियों के मोक्ष के लिए अंतिम प्रणाम का दिव्य अनुष्ठान आरंभ हो गया। शुरू में काशी के विद्वान इस अनुष्ठान पर एकमत नहीं थे। लिहाजा श्रेष्ठ विद्वानों से मिलकर शास्त्र सम्मत बातों का अध्ययन जैसे तैसे परिजनों कि रजामंदी के बाद अनुष्ठान को दशाश्वमेध घाट पर प्रारंभ किया गया। मानना है कि गर्भपात महज एक ऑपरेशन नहीं बल्कि हत्या है। ऐसे में कोख में मारी गई उन बेटियों को भी मोक्ष मिले और समाज से ये कुरीति दूर हो इसके लिए हम लोग ये आयोजन करते हैं।