वाराणसी। पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया 17 सितंबर तक अनवरत चलेगी। परिवार में पुरुषों के न होने पर महिलाएं भी श्राद्धकर्म कर सकती हैं। धर्म सिंधु ग्रंथ, मनुस्मृति, मार्कंडेय पुराण और गरुड़ पुराण में कहा गया है कि महिलाओं को तर्पण और पिंडदान का अधिकार है।
ज्योतिषाचार्य एवं काशी विद्वत परिषद के सदस्य पंडित दीपक मालवीय के अनुसार, वाल्मिकी रामायण में भी बताया गया है कि सीताजी ने राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था। श्राद्ध करने की परंपरा जीवित रहे और लोग अपने पितरों को नहीं भूलें, इसलिए इस प्रकार की व्यवस्था बनाई गई है। मार्कंडेय पुराण में कहा गया है कि अगर किसी का पुत्र न हो तो पत्नी बिना मंत्रों के श्राद्ध कर्म कर सकती है। पत्नी न हो तो कुल के किसी भी व्यक्ति द्वारा श्राद्ध किया जा सकता है। कुछ ग्रंथों में यह कहा गया है कि परिवार और कुल में कोई पुरुष न हो तो सास का पिंडदान बहू भी कर सकती है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि अगर घर में कोई बुजुर्ग महिला है तो युवा महिला से पहले श्राद्ध कर्म करने का अधिकार उसका होगा।
केवल विवाहित महिलाओं को है श्राद्ध का अधिकार
महिलाएं श्राद्ध के लिए सफेद या पीले कपड़े पहन सकती हैं। केवल विवाहित महिलाओं को ही श्राद्ध करने का अधिकार है। श्राद्ध करते वक्त महिलाओं को कुश और जल के साथ तर्पण नहीं करना चाहिए। साथ ही काले तिल से भी तर्पण न करें।
बहू या पत्नी कर सकती है श्राद्ध
पुत्र या पति के नहीं होने पर कौन श्राद्ध कर सकता है, इस बारे में गरुड़ पुराण के ग्यारहवें अध्याय में बताया गया है। कहा गया है कि ज्येष्ठ पुत्र या कनिष्ठ पुत्र के अभाव में बहू या पत्नी को श्राद्ध करने का अधिकार है। इसमें ज्येष्ठ पुत्री या एकमात्र पुत्री भी शामिल है। अगर पत्नी भी जीवित न हो तो भाई अथवा भतीजा, भांजा, नाती, पोता आदि कोई भी श्राद्ध कर सकता है। इन सबके अभाव में शिष्य, मित्र, कोई भी रिश्तेदार अथवा कुल पुरोहित श्राद्ध कर सकता है। परिवार में पुरुष सदस्य के अभाव में कोई भी महिला सदस्य व्रत लेकर पितरों का श्राद्ध-तर्पण कर सकती है।
सीताजी ने दिया था राजा दशरथ को पिंडदान
वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि वनवास के दौरान जब श्रीराम लक्ष्मण और माता सीता के साथ पितृ पक्ष के दौरान गया पहुंचे तो श्राद्ध के लिए कुछ सामग्री लेने गए। उसी दौरान माता सीता को राजा दशरथ के दर्शन हुए जो उनसे पिंड दान की कामना कर रहे थे। इसके बाद माता सीता ने फल्गु नदी, वटवृक्ष, केतकी फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर फल्गु नदी के किनारे श्री दशरथ जी को पिंडदान किया।