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पितृपक्ष में किया गुरु को नमन, गंगा तट पर हुआ तर्पण

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पितरों के तर्पण के पखवारे में गंगा घाटों पर इक्का दुक्का श्रद्धालु ही तर्पण के लिए पहुंच रहे हैं। पितृपक्ष की द्वितीया पर गुरुओं के निमित्त श्राद्ध और तर्पण किया गया। वहीं पिशाच मोचन कुंड पर सन्नाटा पसरा रहा। इक्का दुक्का बाहर से आए यजमानों का श्राद्धकर्म संपन्न कराया गया। बृहस्पतिवार को मणिकर्णिका तीर्थ पर सतुआ बाबा के शिष्य महामंडलेश्वर संतोष दास ने अपने गुरु का श्राद्ध व तर्पण किया। आश्रम के शिष्यों के साथ संतोष दास ने अपने गुरु की निर्वाण तिथि पर विधि-विधान से तर्पण की क्रिया पूर्ण की। गंगा घाट पर भी काफी कम संख्या में श्रद्धालु तर्पण के लिए पहुंचे।
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पितरों की याद में लगाए पौधे
पितृपक्ष के दूसरे दिन बृहस्पतिवार को अस्सी घाट पर तीर्थ पुरोहितों व श्राद्ध करने आए लोगों में तुलसी, बेला, बेल, पीपल, गुड़हल के पौधों का वितरण किया गया। जागृति फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित पौध वितरण कार्यक्रम का शुभारंभ साहित्यकार डॉ. जयप्रकाश मिश्र ने किया। उन्होंने कहा कि पितृपक्ष में अपने पूर्वजों की स्मृति में कुछ न कुछ जरूर करना चाहिए। संयोजन रामयश मिश्र तथा धन्यवाद योगी विनय प्रकाश मिश्र ने किया।
धनाभाव एवं समयाभाव में कैसे करें श्राद्ध
पद्मपुराण में वर्णित है कि जातक अगर धनाभाव एवं समयाभाव में श्राद्ध तिथि पर पितर का स्मरण कर गाय को घास खिलाते हैं तो उसकी पूर्ति होती है। विष्णुपराण में कहा गया है कि अगर यह भी संभव न हो तो इसके अलावा भी श्राद्ध कर्ता एकांत में जाकर पितरों का स्मरण कर दोनों हाथ जोड़कर पितरों से प्रार्थना करें। हे पितृगण मेरे पास श्राद्ध हेतु न उपयुक्त धन है न धान्य है। मेरे पास आपके लिये हृदय में श्रद्धाभक्ति है। मैं इन्हीं के द्वारा आपको तृप्त करना चाहता हूं। आप तृप्त होइए।
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