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Varanasi News: सब कुछ इक दिन खोते हैं लोग, इतने सपने फिर क्यूं बोते हैं लोग...

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सुबह-ए-बनारस आनंद कानन के साहित्यिक प्रकल्प काव्यार्चन की 62वीं कड़ी में मंगलवार को रचनाकारों ने मां से गंगा मां तक को समर्पित रचनाओं का पाठ किया। डॉ. शबनम खातून की अध्यक्षता में हुए इस सत्र में पढ़ी गई रचनाओं में समाज की अन्य विसंगतियों पर भी गीतों, गजलों और कविताओं की प्रस्तुति दी गई।
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डॉ. शबनम खातून ने शेर सुनाया, जिंदगी ठहरती है तो खत्म हो जाती है, जैसे रुके पानी में महक आ जाती है...। उन्होंने पढ़ा, माफ करना भी एक इबादत है हफीज, सबको माफ कर दो माफ करने में क्या रखा है...। कुमार महेंद्र ने इंसान की नीयत पर सवाल उठाते हुए सुनाया, सब कुछ इक दिन खोते हैं लोग, इतने सपने फिर क्यूं बोते हैं लोग, खूबसूरत जिस्म में छिपाकर नियत बुरी, बस चेहरों को रोज रोज धोते हैं लोग...। झरना मुखर्जी ने सुनाया, सबके घर का शृंगार बेटी है, बाप-मां का दुलार बेटी है, दख्ल शरहद पे जाके देखो तो, दुश्मनों पर ये वार बेटी है...। सुबह-ए-बनारस आनंद कानन के संस्थापक सचिव डॉ. रत्नेश वर्मा ने संयोजन व वरिष्ठ कवि अरविंद मिश्र ने संचालन किया। डॉ. नसीमा निशा ने सुनाया, देखो तो दीवार कहां है, दोधारी तलवार कहां है, गंगा जल जो चाहे पी ले, मजहब के पहरेदार कहां है...। इस अवसर पर डाॅ. जयप्रकाश मिश्र, डॉ. ओमप्रकाश श्रीवास्तव, पं. सूर्यकांत त्रिपाठी, पं. प्रियानाथ पांडेय, गिरीश पांडेय, डॉ. महेंद्र तिवारी, अखलाक खान, एड.रुद्रनाथ त्रिपाठी, डॉ. नागेश शांडिल्य, प्रो. वत्सला श्रीवास्तव, डॉ. प्रतापशंकर दूबे, राजलक्ष्मी मिश्रा, जगदीश्वरी चौबे, अरुण द्विवेदी आदि ने रचनाएं सुनाईं।
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