पूछा बहुत दिन बाद दिखे, कैसे हैं। वे साथ हो लिए। प्लेटफार्म पर पहुंच कर बंदरों के झुंड को देखकर पूछा तो कहा कि यहां बंदर तो पहले से रह रहे हैं लेकिन ट्रेनों के आने जाने की वजह से वे छिपे रहते थे। अब लाकडाउन के बाद से पूरे स्टेशन पर इनका राज हो गया है। कुछ रेल कर्मी अथवा समाजसेवी यहां आते हैं और केला, बिस्कुट आदि दे जाते हैं। इसके लिए बंदर दिन भर धमाचौकड़ी करते हैं। बीच-बीच में सफाई होती है लेकिन कुछ दिन बाद ही स्थिति फिर से पहले वाली हो जाती है। वहीं स्टेशन पर तैनात वाणिज्य विभाग के कर्मी ने बताया कि कभी स्टेशन पर पैर रखने की जगह नहीं होती थी, वहां आज बंदरों की धमा चौकड़ी है।
दिन का उजाला भी रात के सन्नाटे से भयवाह
नार्थ ईस्ट का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले और एशिया के सबसे बड़े रेलवे यार्ड वाले पं. दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन के प्लेटफार्म एक से आठ तक सन्नाटा है। एक से चार बजे तक तो इक्का दुक्का रेलकर्मी, जीआरपीकर्मी और आरपीएफ के जवान दिख भी जाते हैं लेकिन पांच बजे से आठ तक तो अजीब सा सन्नाटा पसरा है।
हावड़ा दिल्ली रूट पर स्थित पं. दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन पर प्रतिदिन 175 जोड़ी ट्रेनों का आवागमन होता है। इन ट्रेनों से ड़ेढ से दो लाख यात्री यहां से गुजरते हैं। स्टेशन पर प्रतिदिन बीस हजार से अधिक यात्री ट्रेनों में सवार होते हैं और उतरते हैं। इसके अलावा डेढ़ सौ से अधिक मालगाड़ियों का आवागमन होता है। लॉकडाउन के पहले चालू टिकट लेने के लिए और रिवर्जेशन काउंटर पर ट्रेनों के सीट रिजर्व कराने के लिए लंबी लाइन तो पूछताछ केंद्र पर ट्रेनों की जानकारी के लिए लंबी कतार को संभालना मुश्किल होता रहा है।
ट्रेनों के आने पर यात्रियों की भीड़ को संभालने में जीआरपी आरपीएफ के जवानों को पसीने बहाने पड़ते लेकिन रविवार को हालात पूरी तरह बदले नजर आए। स्टेशन पर जगह जगह तैनात आरपीएफ कर्मी और ड्यूटीरत जीआरपीकर्मी दिखे। इसके अलावा मालगाड़ी, पार्सल स्पेशल और स्टाफ स्पेशल ट्रेन चलाने वाले कुछ कर्मी मिले। जीआरपी इंस्पेक्टर आरके सिंह ने बताया कि स्टेशन पर अब यात्रियों के कोलाहल की जगह सन्नाटे की सांय सांय गूंजती है।
प्लेटफार्म संख्या दो पर कुछ जीआरपीकर्मी बंदरों को केला खिलाते दिखे। पूछने पर कांस्टेबल अभिषेक पांडेय ने बताया कि बंदरों को देखकर दया आती है तो कभी कभार केला खिला देता हूं। बाहर निकलते समय डिप्टी एसएस एएन प्रसाद मिले। बताया कि स्टेशन की हालत देख कर अजीब सा एहसास होता है। रात में यहां ड्यूटी करने वालों के लिए यह किसी डरावने सपने से कम नहीं है। यह देख कर यही बात में घूमने लगी कि वक्त बड़ा बलवान रे भैया। कभी स्टेशन पर दिन रात का फर्क पता ही नहीं चलता था, आज दिन का उजाला भी रात के सन्नाटे से भयावह है।