तू पार कर द्वार देहरी,
पैर के बंधन खोल आज
फिजा में बिखरी कोई धुन पे
संग हवा के डोल आज
सतरंगी आसमा के रंगों में
रंग तू भी घोल आज
हटा के परदे होंठो से
तू मन की बातें बोल आज
है पता मुझे,
लोग तुझे आजादी के
गीत न गाने देंगे ।
बातें तेरे अतीत की कर
तुझको ताने देंगे ।
चुप तुझे करने की खातिर
लोग लाख बहाने देंगे ।
इन बातों की तू परवाह न कर
न आंधी तूफान से डर
सिर्फ जज्बात नही, इंकलाब तू लिख
संग आँगन के आसमान भी लिख
यू छुप के तू लिखेगी कब तक
अब अपनी पहचान भी लिख
जो दर्द सहे हैं चुप रह कर
उन के बचे निशान भी लिख
तू पार कर द्वार देहरी
पैर के बंधन खोल आज
फिजा में बिखरी कोई धुन पे
संग हवा के डोल आज
इसके बाद 14 जुलाई 2018 को उसने फिर अपना फेसबुक पेज ओपन किया है और एक दूसरी कविता जिंदगी से वक्त मांगते हुए पोस्ट की है। इस कविता के नीचे भी अपना नाम लिखा है। कविता कुछ इस प्रकार है...
ए ज़िंदगी
तू थोड़ा सा वक़्त दे
थोड़ी सी रुक जरा
जरा साँस लेने दे
जरा जख्मों को भरने दे
जरा आंसू छुपाने दे
अधूरे सपनों को मरने दे
पलकों पे नींद आने दे
जरा फिर से मुस्कुराने दे
ए ज़िंदगी
तू थोड़ी सी रुक जरा
थोड़ा सा वक़्त दे
11 अक्टूबर 2018 को मणि मंजरी ने इसी पेज पर बलिया में जॉइनिंग का पोस्ट भी डाला है। उस पोस्ट से यह महसूस हो रहा है कि जिले में ज्वाइन करते वक्त वह कितनी खुश थीं, लेकिन उसे क्या पता था कि उसकी पहली पोस्टिंग ही उसकी आखिरी बन जाएगी और उसे इस बेदर्द जमाने से जिंदगी की जंग हारनी पड़ेगी।