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शिव की नगरी में बसता है मिनी नेपाल, काशी में विराजते हैं पशुपति नाथ

Sun, 02 Feb 2020 07:54 PM IST
गीतार्जुन गौतम आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
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ललिता घाट पर बना पशुपति नाथ मंदिर। - फोटो : अमर उजाला।
शिव की नगरी काशी में ललिता घाट पर मिनी नेपाल बसता है। विश्वनाथ कॉरिडोर के पहले पाथवे के प्रवेश द्वार जलासेन घाट के बगल में स्थित भगवान पशुपति का मंदिर नेपालियों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। नेपाल के पशुपति नाथ मंदिर का प्रतिरूप इस मंदिर में प्रवेश के बाद काशी में ही नेपाल का एहसास होगा। काशी में स्थित पशुपति नाथ का ये मंदिर नेपाली मंदिर के नाम से भी मशहूर है। मंदिर के संरक्षण का काम भी नेपाल सरकार ही करती है।
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काशी जहां मां गंगा के तट पर बसी है तो वहीं काठमांडू शहर बागमती नदी के किनारे विकसित हुआ। काशी में स्थित पशुपति नाथ के मंदिर की नक्काशी और नेपाल के मंदिर की नक्काशी भी बिल्कुल हूबहू है। इसके अलावा दोनों मंदिरों की भव्यता भी एक जैसी ही है। काशी और नेपाल के पशुपति नाथ के मंदिर में पूजापाठ भी नेपाली समुदाय के लोग ही करते हैं, वो भी बिल्कुल एक जैसी परंपरा के अनुसार।
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ललिता घाट स्थित यह मंदिर काशी के अन्य शिव मंदिरों से बिल्कुल अलग है। मंदिर का निर्माण काशी के अन्य शिवालयों की तरह पत्थर से नहीं बल्कि नेपाली लकड़ी के प्रयोग से हुआ है। नेपाली लकड़ी से निर्मित यह मंदिर लोगों को खूब आकर्षित करता है। मंदिर के भीतर गर्भगृह में पशुपतिनाथ के रूप में शिवलिंग स्थापित हैं। माना जाता है कि काशी के इस पशुपतिनाथ के दर्शन से वही फल प्राप्त होता है जो नेपाल के पशुपतिनाथ के दर्शन से होता है।

मंदिर का निर्माण नेपाल के राजा राणा बहादुर शाह ने करवाया था
पशुपतिनाथ मंदिर का निर्माण नेपाल के राजा राणा बहादुर साहा ने करवाया था। वाराणसी में मंदिर निर्माण के उद्देश्य से वो काशी आए और प्रवास किया। वर्ष 1800 से 1804 तक नेपाल के राजा राणा बहादुर शाह ने काशी में प्रवास किया। प्रवास के दौरान पूजा पाठ के लिए उन्होंने काशी में शिव मंदिर बनवाने का निर्णय लिया, वो भी नेपाल के वास्तु और शिल्प के अनुसार। गंगा किनारे घाट की भूमि इस मंदिर के निर्माण के लिए चुनी और इसका निर्माण शुरू कराया इसी दौरान 1806 में उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के बाद उनके बेटे राजा राजेन्द्र वीर विक्त्रस्म साहा ने इस मंदिर का निर्माण 1843 में पूरा कराया। बीच में कई वर्षों तक इस मंदिर का निर्माण रुका था। यही वजह रही कि इस मंदिर के पूरा होने में चालीस साल का समय लग।
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नेपाल से मंगाई गई थी लकड़ी
मंदिर का निर्माण नेपाल से आये कारीगरों ने किया था। मंदिर निर्माण में प्रयोग की गयी लकड़ी को भी राजा ने नेपाल से ही मंगवाया था। कारीगरों ने मंदिर में लगायी गयी लकड़ी पर बेहतरीन नक्काशी को उभारा। मंदिर के चारों तरफ लकड़ी का दरवाजा होने के साथ भित्ती से लेकर छत तक सबकुछ लकड़ी से बनाया गया है। इन लकड़ियों पर विभिन्न प्रकार की कलाकृतियां उभारी गई हैं। जो देखने में बेहद आकर्षित करती हैं।  नेपाल के मंदिरो की तर्ज पर ही इस मंदिर के बाहर भी एक बड़ा सा घण्टा भी है। वहीं दक्षिण द्वार के बाहर पत्थर का नंदी बैल भी है। पशुपतिनाथ का यह मंदिर सुबह काशी के अन्य मंदिरों  के समय ही खुलता और बंद होता है।
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दिलचस्प है कहानी
वाराणसी में स्थित नेपाली मंदिर की कहानी बहुत ही दिलचस्प है और ये आपको सीधे 19 वीं सदी के काल में ले जाती है। जैसा कि आपको नाम से ही पता चला रहा है, यह नेपाली मंदिर नेपाली वास्तुशैली में बना हुआ है। दिलचस्प बात है कि यह वाराणसी के सबसे पुराने शिव मंदिरों में से एक है। जी हाँ, आपने बिल्कुल सही सुना, इस नेपाली मंदिर के प्रमुख देवता शिव भगवान हैं।
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बहुत पहले नेपाल के राजा राणा बहादुर साहा ने वाराणसी में निर्वासन ले लिया। उन्होंने ही निश्चय किया कि वह नेपाल की राजधानी काठमांडू में स्थापित पशुपतिनाथ मंदिर की ही तरह हूबहू एक शिव मंदिर यहां भी बनवाएंगे। हालाँकि उनके निर्वासन के दौरान मंदिर का निर्माण कार्य शुरू तो हो गया पर इसे पूरा होने में पूरे 30 सालों का समय लगा। मंदिर के निर्माण कार्य के दौरान ही राजा राणा बहादुर शाह नेपाल को लौट गए जहां उनकी, उनके सौतेले भाई शेर बहादुर शाह द्वारा चाकू मार कर हत्या कर दी गई। उनकी मृत्यु के बाद मंदिर को उनके पुत्र राजेंद्र बिक्रम साहा ने समय सीमा के 20 साल बाद बनवा कर पूरा किया।
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काठवाला है मंदिर 
जैसा कि यह मंदिर लकड़ी का बना हुआ है इसलिए इसे काठवाला मंदिर भी कहते हैं, काठ मतलब लकड़ी। यह मंदिर टैराकोटा, लकड़ी और पत्थर के इस्तेमाल से नेपाली वास्तुशैली में बनाया गया है। यह रचना नेपाली कारीगरों की उत्कृष्ट शिल्प कौशल को बखूबी दर्शाती है। इसलिए यह वाराणसी के कुछ खास मंदिरों में से एक है। इस कांठवाले मंदिर को छोटा खजुराहो भी कहा जाता है। जी हाँ, इसे ऐसा इसलिए कहा जाता है क्यूंकि इस लकड़ी के मंदिर में जो मूर्तियां खुदी हुई हैं वे खजुराहो मंदिर की तरह ही हैं। हालाँकि यह रचना लकड़ी की बनी हुई है, पर फिर भी यह दीमक मुक्त है। यह मंदिर स्थानीय कारीगरों और राजगीरों की निपुणता को दर्शाता हुआ आज भी समय की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरा है।  नेपाली मंदिर वाराणसी के ललिता घाट के पास ही स्थित है। ललिता घाट में शिव मंदिर के साथ-साथ ललिता गौरी मंदिर भी स्थापित है।
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