धामूपुर गांव उस समय चर्चा में आया जब 10 सितंबर 1965 को पाकिस्तान सेना अमृतसर को घेरकर उसको अपने नियंत्रण में लेने को तैयार थी, अब्दुल हमीद ने पाक सेना को अपने अभेद्य पैटर्न टैंकों के साथ आगे बढ़ते देखा। प्राणों की चिंता किए बिना अब्दुल हमीद ने अपनी तोपयुक्त जीप को टभ्ले के समीप खड़ा किया और गोले बरसाते हुए शत्रु के कई टैंकों को ध्वस्त कर दिया।
इसके बाद पाकिस्तानी सेना के पैर जंग के मैदान से उखड़ गए और वह पीछे लौटने को मजबूर हो गए। वीर अब्दुल हमीद ने अपने साहस और पराक्रम से दुश्मनों के दांत खट्टे किए थे। इस लड़ाई में माटी के लाल ने अपनी जान की कुर्बानी दी थी। वीर अब्दुल हमीद को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
उनकी प्रेरणास्रोत रही पत्नी रसूलन बीबी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर देश में सेना के शीर्ष अधिकारियों के बीच अपनी विशेष पहचान रखती थी। जनपद में भी अब्दुल हमीद की स्मृतियों को सहेजने में उनके प्रयासों की लोग सराहना करते नहीं थकते हैं।
निधन पर पूरा इलाका ही नहीं जनपद और पूर्वांचल में शोक की लहर दौड़ गई है। यहां आज भी सुबह-शाम फौज की तैयारी करने वालों की भीड़ देखने को मिलती है। रसूलन बीबी के निधन के बाद शोक संवेदना का क्रम शुरू हो गया है।