नम्रता ने बताया कि उनकी माताजी और बहन का निधन कोविड के समय हुआ था और उस समय तेरह दिन का अनुष्ठान कराना संभव नहीं हुआ था। पिताजी हमेशा कहते थे कि उनकी पत्नी और बड़ी बहन की त्रिरात्रि हुई है, इसलिए उनकी आत्मा को शांति नहीं मिली होगी, अतः पिताजी के निर्देश पर एक साल के अंदर पिशाचमोचन के लिए पांच दिन का अनुष्ठान कराया गया।
अंतिम संस्कार के लिए पैसे तक नहीं दिए गए
नम्रता ने बताया कि पिताजी के अंतिम संस्कार के बाद रात में दो बजे उन्हें फोन कर 25,090 रुपये का भुगतान करने को कहा गया। उन्होंने बताया कि रामकुमार भैया ने कहा था कि अगर नम्रता ने व्यवस्था कराई है तो उसका भुगतान वही करेगी। हमें कुछ पता ही नहीं था कि रामकुमार भैया कब आएंगे और कब पिताजी का कर्म करेंगे। उन्होंने ब्राह्मण भोज नहीं कराया, 13 पंडितों को बुलाया गया और लिफाफा पकड़ाकर भेज दिया गया। हम लोग इतने व्यस्त नहीं हैं कि 25,000 रुपये का भुगतान न कर सकें।
नम्रता ने कहा कि पिताजी उन्हें अपना बेटा कहते थे, अगर उनकी इच्छा होती ती कहते कि तुम ही मेरा कर्मकांड करोगी, तुम ही दाह संस्कार करोगी। वह हमेशा कहते थे कि नम्रता ने आखिरी समय में उनकी सेवा की। अंतिम समय में किसी ने उनकी चिंता नहीं की, कोई उन्हें देखने नहीं आया। पिताजी किस अवस्था में अस्पताल में भर्ती थे, भैया केवल एक दिन आए और चले गए। क्या वे 12-13 दिन रुक नहीं सकते थे? क्या उन्होंने यह नहीं कहा कि नम्रता, मै पिताजी को एम्स दिल्ली ले जाकर उनका इलाज कराऊंगा? ऐसा कुछ नहीं किया गया। बस आए, फोटो खिंचवाए और चले गए, यह बहुत गलत है। पिताजी के आखिरी जीवन में पुत्र का दायित्व निभाना चाहिए था, जिसमें वे असफल रहे। मैं तन मन धन से ब्राह्मणभोज कराऊंगी।
पं. रामकुमार मिश्र ने कहा कि नम्रता ने पिताजी का पुराना मकान (छोटी गैबी) बिना पिताजी को बताए बेच दिया। जब मुख्यमंत्री यहां आए थे तो नम्रता ने नकली रिश्तेदारों को उनके सामने प्रस्तुत कर दिया। जहां तक कर्मकांड की बात है, उसे वह पूरी निष्ठा से कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि नम्रता संपत्ति के लालच में इस तरह का आरोप लगा रही है। अगर मैं पिताजी के संस्कार सनातन के हिसाब से करूंगा, तो मैं तय करूंगा, इसका प्रचार नहीं करूंगा।
हम उसे जवाब नहीं देना चाहते। हम एक दिन के लिए दिल्ली भी गए थे और वहां भी शोक सभा करनी थी। मैं पिताजी के दसवें के लिए हल्ला नहीं करने वाला। उसे शर्म आनी चाहिए, उसके इस तरह करने से पिताजी को सद्गति नहीं मिलेगी। मुखाग्नि मेरे पुत्र राहुल ने दी है। तीन साल से दोनों बहनों ने पिताजी का नाम मिट्टी में मिला दिया है। दोनों के आपसी झगड़ों में पिताजी की कितनी बदनामी हुई है। जितनी उसकी उम्र है उतना मेरा कॅरिअर है। अगर इसे नहीं रोका गया तो मैं मानहानि का मुकदमा कर दूंगा। उसके समर्थकों ने उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी है।