वाराणसी। एक ही जाम ने दोनों का भरम तोड़ दिया/रिंद मसजिद में गया मौला गया मयखाने में...। संत मोरारी बापू ने बुधवार को मधुपान और मद्यपान के फर्क को समझाते हुए नशामुक्ति का संदेश दिया।
कहा कि मद्यपान मधुर नहीं होता। कुछ क्षणों के लिए मस्ती देता है लेकिन बाद में विषाद और पश्चाताप के अलावा उससे और कुछ नहीं मिलता। इसलिए जनम-जनम की मस्ती देने वाली रामकथा का मधुपान कर जीवन को बेड़ापार लगाना चाहिए।
अस्सी घाट से लगे भव्य पंडाल में संत मोरारी बापू ने संगीतमय रामकथा में कहा कि प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं है। सुख किसी को परेशान करके अर्जित नहीं किया जा सकता। सुख पाने के लिए दूसरों को सुख देना पड़ता है। उन्होंने शेर पढ़ा कि- ये जरूरी नहीं कि तुम मेरी निगाहों में रहो/ तुम जहां भी रहो अल्लाह की पनाहों में रहो...।
उन्होंने कभी गुजरात की मीठी बोली में प्रेम रस पागने की कोशिश की तो कभी मिथिला की संस्कृति से आत्मीयता और संस्कार का नाता जोड़ा। उन्होंने मानस की चौपाई पढ़ी कि- जहं वसंत ऋतु रही लुभाई...।
कहा कि पूरी दुनिया में वसंत मिथिला से आता है। तुलसी दास ने कहा है कि वसंत ऋतु वहां बारहो महीने मुग्ध होकर पड़ी रही है। मिथिला की यह महिमा सीता के जन्म स्थान की वजह से है। संत ने कहा कि राम चरित मानस वृत्तियों को बदलने का ग्रंथ है। वस्त्र बदलने का नहीं।
कहा कि पश्चिमी संस्कृति के बढ़ते प्रभावों के बीच हर वर्ग के लोगों की इतनी बड़ी रामकथा में जुटान साबित करती है कि राम का नाम कभी पुराना या उबाऊ नहीं हो सकता। राम कथा हमेशा नूतन बनी रहती है। उन्होंने गंगा शुद्धिकरण के अभियान पर चुटकी भी ली। कहा कि पहले आंतरिक शुद्धिकरण किया जाना चाहिए। कथा के बाद कुंवर अनंत नारायण सिंह, सूबे के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह, केशव जालान, कृष्ण कुमार जालान ने व्यास पीठ की आरती उतारी।