सीता शुक्ला को सम्मानित करतीं एनआरआई राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) स्वाति सिंह
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संकट की घड़ी में सास-बहू के साहस की कहानी को लोग लखनो से लेकर वाराणसी तक अपने-अपने ढंग से सुना रहे हैं। वैन में सवार बच्चों के परिजन सीता और उनकी बहू को भगवान मान रहे हैं।
ड्राइवर की लापरवाही को कोसते हुए बताया, सुबह वैन आने वाली थी। तभी नाती ने बुखार के कारण स्कूल न जाने की बात कही। मैंने भी मना कर दिया था लेकिन घर वाले बोले कि घर रहने पर बच्चे बदमाशी करेंगे। इससे अच्छा है कि स्कूल जाकर पढ़ाई कर लेंगे। इसी दौरान वैन घर के सामने आकर रुक गई। वैन में बच्चे पहले से बैठे थे। नाती भी उनके साथ बैठ गया।
बच्चे को बिठाकर मुड़ते देखा कि वैन के पिछले दरवाजे के पास से तेल गिर रहा था। जानकारी ड्राइवर को दी तो वह वैन से उतरा। जैसे ही उसने डिग्गी उठाई... बस फिर क्या था। देखते-देखते वैन में आग लग गई। बच्चे डर गए और चिल्लाने लगे। बच्चों की चीख-पुकार देखी नहीं गई। न जाने कहां से ताकत आ गई और आग बुझाने लगी।
ये भी नहीं सोचा कि वैन में सिलिंडर लगा है और इसके फटने पर उनके भी चिथड़े उड़ जाएंगे। चीखने-चिल्लाने के कारण आसपास के लोग भी दौड़ पड़े। तब तक कुछ हद तक उन्हें आग बुझाने में सफलता मिल चुकी थी।
सीता के पति जयशंकर शुक्ला बताते हैं कि वैन में आग लगने के बाद उनकी पत्नी सीता देवी उधर दौड़ पड़ीं। तभी उनकी देवरानी की बहू सुमन भी यह कहते हुए दौड़ पड़ी कि ‘अरे अम्मा! हऊ देखीं गड़िया में आग लग गइल। बच्चवन जर जइहें...।’ वैन का गेट नहीं खुल रहा था।
सुमन ने ईंट से वैन का दरवाजा तोड़ दिया। बच्चों को निकालने लगीं। मामूली रूप से झुलसी सुमन बताती हैं-लपटें इतनी विकराल थीं कि नजदीक जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। फिर हम दोनों ने हाथ में शॉल लपेटी और एक-एक कर बच्चों को निकालना शुरू किया। बताया, उस समय बच्चों को बचाने के अलावा और कुछ सूझ ही नहीं रहा था।