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19 बच्चों की जिंदगी बचाने वाली महिला को मंत्री स्वाति सिंह ने दिया अमर उजाला अपराजिता सम्मान

Tue, 15 Jan 2019 04:09 PM IST
shashikant misra न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
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सीता शुक्ला को सम्मानित करतीं एनआरआई राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) स्वाति सिंह - फोटो : अमर उजाला
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भदोही जिले के लखनो गांव में शनिवार सुबह आग का गोला बनी स्कूल वैन से 19 बच्चों को निकालने वाली महिला सीता शुक्ला की बहादुरी इन दिनों हर किसी की जुबान पर है। उनकी इसी बहादुरी का सम्मान करने के लिए एनआरआई राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) स्वाति सिंह बीएचयू ट्रॉमा सेंटर पहुंचीं।
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प्रदेश की राज्य राज्यमंत्री स्वाति सिंह ने कहा मासूमों की जान बचाने वाली ये महिलाएं सही मायने में अपराजिता हैं।  अमर उजाला के अभियान अपराजिता के तहत स्वाति सिंह ने सीता शुक्ला और उनकी बहू सुमन शुक्ला को बुके, शाल, लक्ष्मीबाई की प्रतिमा और अपराजिता पोस्टर भेंट कर सम्मानित किया। इस अवसर पर सीता शुक्ला की आखों से अश्रुधार फूट पड़ी। राज्यमंत्री ने वार्डों में जाकर वहां भर्ती अन्य बच्चों का भी हाल लिया। इससे पहले मंत्री स्वाति सिंह ने अपराजिता के पोस्टर का विमोचन किया औऱ अमर उजाला के इस अभियान की भूरि-भूरि सराहना की।

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बच्चों की जान बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगाने में झुलसने के बाद बीएचयू के ट्रॉमा सेंटर के जनरल सर्जरी वार्ड में भर्ती 55 साल की सीता शुक्ला घटना को भूल नहीं पा रही हैं। घटना की जानकारी देने के दौरान कई बार उनकी आंखें भर आईं।

पढ़ेंः यूपीः हर जुबान पर सास-बहू की बहादुरी के चर्चे, बच्चों के लिए दोनों बनीं 'भगवान'

घटना में दोनों हाथ, पैर झुलसने के बाद भी सीता बच्चों की जान बचाने के बाद अपने को सौभाग्यशाली मान रही हैं। कहते हैं-  सीता शुक्ला और उनकी बहू सुमन मौके पर नहीं होती होती तो शायद एक भी बच्चा नहीं बचता। घटना में सुमन मामूली रूप से झुलसी थीं। 
 
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घटना को भूल नहीं पा रही सीता शुक्ला

सीता शुक्ला को सम्मानित करतीं एनआरआई राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) स्वाति सिंह - फोटो : अमर उजाला
संकट की घड़ी में सास-बहू के साहस की कहानी को लोग लखनो से लेकर वाराणसी तक अपने-अपने ढंग से सुना रहे हैं। वैन में सवार बच्चों के परिजन सीता और उनकी बहू को भगवान मान रहे हैं।  

ड्राइवर की लापरवाही को कोसते हुए बताया, सुबह वैन आने वाली थी। तभी नाती ने बुखार के कारण स्कूल न जाने की बात कही। मैंने भी मना कर दिया था लेकिन घर वाले बोले कि घर रहने पर बच्चे बदमाशी करेंगे। इससे अच्छा है कि स्कूल जाकर पढ़ाई कर लेंगे। इसी दौरान वैन घर के सामने आकर रुक गई। वैन में बच्चे पहले से बैठे थे। नाती भी उनके साथ बैठ गया।

बच्चे को बिठाकर मुड़ते देखा कि वैन के पिछले दरवाजे के पास से तेल गिर रहा था। जानकारी ड्राइवर को दी तो वह वैन से उतरा। जैसे ही उसने डिग्गी उठाई... बस फिर क्या था। देखते-देखते वैन में आग लग गई। बच्चे डर गए और चिल्लाने लगे। बच्चों की चीख-पुकार देखी नहीं गई। न जाने कहां से ताकत आ गई और आग बुझाने लगी।

ये भी नहीं सोचा कि वैन में सिलिंडर लगा है और इसके फटने पर उनके भी चिथड़े उड़ जाएंगे। चीखने-चिल्लाने के कारण आसपास के लोग भी दौड़ पड़े। तब तक कुछ हद तक उन्हें आग बुझाने में सफलता मिल चुकी थी। 

सीता के पति जयशंकर शुक्ला बताते हैं कि वैन में आग लगने के बाद उनकी पत्नी सीता देवी उधर दौड़ पड़ीं। तभी उनकी देवरानी की बहू सुमन भी यह कहते हुए दौड़ पड़ी कि ‘अरे अम्मा! हऊ देखीं गड़िया में आग लग गइल। बच्चवन जर जइहें...।’ वैन का गेट नहीं खुल रहा था।

सुमन ने ईंट से वैन का दरवाजा तोड़ दिया। बच्चों को निकालने लगीं। मामूली रूप से झुलसी सुमन बताती हैं-लपटें इतनी विकराल थीं कि नजदीक जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। फिर हम दोनों ने हाथ में शॉल लपेटी और एक-एक कर बच्चों को निकालना शुरू किया। बताया, उस समय बच्चों को बचाने के अलावा और कुछ सूझ ही नहीं रहा था। 



 
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