उस्ताद बिस्मिल्लाह खां
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दीपिका कल्चरल सोसायटी आफ इंडिया के अध्यक्ष अजय गुप्ता पिछले 20 साल से शहनाई को सहेजने में लगे हुए हैं। उनका कहना है कि शहनाई की दुर्दशा के कारण कलाकार तो अब साड़ी बीन रहे हैं। कोई टोटो चला रहा तो कोई चांदी का वरक कूट रहा है। सरकार को भी इस दिशा में ध्यान देना होगा। पहले देश में जितने भी बड़े लोगों की शादियां होती थीं, उनमें बनारस की शहनाई एक शोभा हुआ करती थी।
ढोल-शहनाई से पर्यटकों का स्वागत
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वरिष्ठ पत्रकार राजेश गुप्ता का कहना है कि दुनिया कभी शहनाई से फूटे चैती और कजरी की तान से मदमस्त होती थी, आज उसी साज की धुनें गमजदा हैं। क्योंकि घरानेदार संगीत की दुनिया में गायन, वादन और नृत्य में सितार, तबला, सारंगी, हारमोनियम इन सबके तमाम गुरुकुल और प्रशिक्षण संस्थान संगीत की नई फौज तैयार करने में जुटे हुए हैं। जिस शहनाई को बिस्मिल्लाह खां ने बधावा, तिलक और बरात से उठाकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्थापित किया, उसी शहनाई की धुन अब आने वाले दिनों में बधावा, बरात, तिलक और पुज्जैया में भी मयस्सर नहीं होगी।
शहनाई वादक महेंद्र प्रसन्ना का कहना है कि अब तो आकाशवाणी और दूरदर्शन में भी शहनाई के कलाकार नहीं हैं। गिनती के कलाकार हैं। उनके जाने के बाद शहनाई का कोई नामलेवा भी नहीं रह जाएगा। शहनाई बनारस से ही पैदा हुई और आज बनारस में ही दम तोड़ रही है। डीजे, ढोल के कारण शहनाई की मंगल ध्वनि परंपरा लुप्त हो गई है।