कई ऐसे निवर्तमान पार्षद हैं, जिन्होंने अपनी पत्नी को चुनाव मैदान में उतारा और सफलता दिलाई है। इनमें हाजी ओकास अंसारी की पत्नी शबाना और रमजान अली की पत्नी फरजाना का नाम शामिल है।
वाराणसी नगर निगम के चुनाव में मुस्लिम मतों के बिखराव ने भाजपा की राह आसान कर दी। शहरी क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता दो धुरी में बंटे दिखे। कांग्रेस से जीतने वाले आठ पार्षद मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से आते हैं। ठीक यही हाल सपा का भी रहा है। शहरवासियों का कहना है कि मुस्लिम मतों का बिखराव न होता तो भाजपा को इतनी बंपर जीत नहीं नसीब होती। चुनाव की घोषणा के साथ ही जातीय व सामाजिक समीकरण साधे जाने लगे थे।
सपा ने यादव, मुस्लिम व क्षत्रियों का गठजोड़ बनाने का प्रयास किया। इसी तरह कांग्रेस ने कायस्थ को चुनाव मैदान में उतारकर भाजपा के कैडर वोटबैंक में सेंधमारी का प्रयास किया। भाजपा ने ब्राह्मण प्रत्याशी पर दांव लगाकर विपक्ष की रणनीति ध्वस्त कर दी। सवर्ण के साथ ही अति पिछड़ा वर्ग के मतदाता भाजपा के पक्ष में एकजुट दिखे। इसी वजह से भाजपा को बड़े अंतर से जीत मिली है।
शहर के 100 वार्डों में 63 पर जीत हासिल कर चुकी भाजपा ने हारी हुई सीटों पर समीक्षा शुरू कर दी है। दरअसल, इस चुनाव में विधायकों ने अपने विधानसभा के पार्षद प्रत्याशियों का चयन किया था। अपनों को टिकट देने की होड़ में कई वार्ड में पुराने कार्यकर्ता नजरअंदाज हुए और बड़ी संख्या में बागी मैदान में उतरे और जीते भी हैं।