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Nikay Chunav Result: वाराणसी नगर निगम में जीते केवल 15 मुस्लिम पार्षद, हार गए भाजपा के प्रत्याशी

Mon, 15 May 2023 12:09 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

वाराणसी नगर निगम के चुनाव में इस बार 15 मुस्लिम पार्षद जीते हैं। सपा और कांग्रेस के छह-छह और तीन निर्दल मुस्लिम पार्षद जीते हैं। भाजपा ने इस बार एक मुस्लिम प्रत्याशी को मैदान में उतारा था। हार का सामना करना पड़ा।
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सपा के खाते में छह मुस्लिम पार्षद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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वाराणसी नगर निगम के मिनी सदन में इस बार मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व कम रहेगा। इस बार 15 मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीतकर पार्षद बने हैं, जबकि 2017 में 21 पार्षद थे। इस बार मुस्लिम मतदाता दो धड़ों में बंटे दिखे हैं। कांग्रेस व सपा को बराबर ही वोट मिले हैं। दोनों पार्टियों ने छह-छह मुस्लिम पार्षद बने हैं। हालांकि भाजपा ने पहली बार मुस्लिम प्रत्याशी को चुनाव मैदान में उतारा था, लेकिन जीत नहीं मिल सकी।

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सपा के खाते में छह मुस्लिम पार्षद हैं। इनमें जोल्हा दक्षिणी वार्ड से मोहम्मद इरफान, लोहता से रिजवाना शाहिना फिरदौस, अलईपुरा से रजिया बेगम, बागहाड़ा से समा, ओंकालेश्वर से साजिया खान और लल्लापुरा कला से हारून अंसारी ने चुनाव में जीत हासिल की है।

कांग्रेस की शबाना अंसारी ने जलालीपुरा वार्ड से चुनाव जीता है। मदनपुरा से इशरत परवीन, काजी सादुल्लापुरा से फरजाना, कमलगड़हा से नूरजहां परवीन, सरैयां से जूफा जबी व कमलापुरा से गुलशन अली ने बाजी मारी है। निर्दलीय पार्षदों में बलुआबीर की ताजर बीबी, बंधु कच्चीबाग के शाहिन परवीन और जलालीपुरा के मोहम्मद तैयब का नाम शामिल है। निर्वाचित पार्षदों का कहना है कि शपथ ग्रहण के बाद मूलभूत समस्याओं का समाधान कराया जाएगा।
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ये भी पढ़ें: वाराणसी में सपा-कांग्रेस मिलकर भी नहीं पा सके BJP जितने वोट, विपक्ष की योजना पर फिरा पानी

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पत्नियां बनीं पार्षद

कई ऐसे निवर्तमान पार्षद हैं, जिन्होंने अपनी पत्नी को चुनाव मैदान में उतारा और सफलता दिलाई है। इनमें हाजी ओकास अंसारी की पत्नी शबाना और रमजान अली की पत्नी फरजाना का नाम शामिल है।

मुस्लिम मतों के बिखराव का मिला भाजपा को फायदा

वाराणसी नगर निगम के चुनाव में मुस्लिम मतों के बिखराव ने भाजपा की राह आसान कर दी। शहरी क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता दो धुरी में बंटे दिखे। कांग्रेस से जीतने वाले आठ पार्षद मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से आते हैं। ठीक यही हाल सपा का भी रहा है। शहरवासियों का कहना है कि मुस्लिम मतों का बिखराव न होता तो भाजपा को इतनी बंपर जीत नहीं नसीब होती। चुनाव की घोषणा के साथ ही जातीय व सामाजिक समीकरण साधे जाने लगे थे।

सपा ने यादव, मुस्लिम व क्षत्रियों का गठजोड़ बनाने का प्रयास किया। इसी तरह कांग्रेस ने कायस्थ को चुनाव मैदान में उतारकर भाजपा के कैडर वोटबैंक में सेंधमारी का प्रयास किया। भाजपा ने ब्राह्मण प्रत्याशी पर दांव लगाकर विपक्ष की रणनीति ध्वस्त कर दी। सवर्ण के साथ ही अति पिछड़ा वर्ग के मतदाता भाजपा के पक्ष में एकजुट दिखे। इसी वजह से भाजपा को बड़े अंतर से जीत मिली है।
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विधायकों के निर्णय पर उठने लगे सवाल

शहर के 100 वार्डों में 63 पर जीत हासिल कर चुकी भाजपा ने हारी हुई सीटों पर समीक्षा शुरू कर दी है। दरअसल, इस चुनाव में विधायकों ने अपने विधानसभा के पार्षद प्रत्याशियों का चयन किया था। अपनों को टिकट देने की होड़ में कई वार्ड में पुराने कार्यकर्ता नजरअंदाज हुए और बड़ी संख्या में बागी मैदान में उतरे और जीते भी हैं।
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