अविमुक्त पुरी काशी में वरुणा के तट पर विराजमान शैलेश्वर महादेव और शैलेश्वरी देवी के प्रादुर्भाव की कथा भी निराली है। काशी खंड के अनुसार भगवान शिव और पार्वती के विवाह के बाद उनकी माता ने पुत्री का कुशल क्षेम जानने के लिए पति से प्रार्थना की। राजा हिमवान रत्न, माणिक्य और वस्त्र लेकर वरुणा के तट पर पहुंचे। काशी का वैभव देखकर वह भी चकित रह और सोचने लगे ऐसी संपत्ति तो कुबेरपुरी और वैकुंठपुरी में भी नहीं है। उन्होंने सेवकों काे आदेश दिया कि सूर्योदय के पूर्व रात्रि भर में भव्य शिवालय का निर्माण करें। मंदिर में ही चंद्रकांतमणि के शैलेश्वर शिवलिंग की स्थापना हुई।
शिवगणों ने मंदिर के निर्माण का समाचार शिवजी को सुनाया। शिव ने पार्वती संग मंदिर में प्रवेश किया तो महालिंग को देखकर प्रसन्न हुए। माता पार्वती ने प्रार्थना की कि हे नाथ! इस लिंग में आपको निवास करना चाहिए और भक्तों को लोक और परलोक में पूर्ण समृद्धि प्रदान करें। शिव ने कहा कि वह इसमें निवास करेंगे और इसकी पूजा करने वालों को मोक्ष दूंगा। दर्शन करने वालों को दुख से पीड़ित नहीं होना पड़ेगा। माता पार्वती ने वरदान दिया कि जो लोग शैलेश्वर के भक्त होंगे वह मुझे पुत्र के समान प्रिय होंगे। इसके बाद शैलेश्वर महादेव के साथ ही शैलेश्वरी देवी का पूजन आरंभ हो गया।