बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में शेषावतार महर्षि पतंजलि ने कभी अपने गुरु महर्षि पाणिनी के व्याकरण अष्टाध्यायी पर महाभाष्य रचा था। योग सूत्र की रचना उन्होंने कभी इसी नगरी में की थी, वहां नाग पंचमी पर रविवार को मेला भी लगा और शास्त्रार्थ की परंपरा भी जीवंत हुई। अखाड़ों में पहलवान भिड़े। कहीं शारीरिक सौष्ठव का प्रदर्शन करने के लिए दंगल हुआ तो कहीं महुअर का खेल। कहा जाता है कि ‘योगसूत्र’ के रचनाकार महर्षि पतंजलि ने कभी जैतपुरा मोहल्ले में नागकूप पर श्रावण कृष्ण पंचमी को ही अपने गुरु महर्षि पाणिनी के ‘अष्टाध्यायी’ ग्रंथ पर महाभाष्य पूरा किया था। तभी से उस स्थान पर मेला लगता आ रहा है।
महर्षि पाणिनी के व्याकरण अष्टाध्यायी के महाभाष्य के साथ ही योगसूत्र की रचना करने वाले महर्षि पतंजलि की नगरी काशी में रविवार को नाग देवता की सविधि पूजा की गई। लावा-दूध का भोग लगाया गया। शेषावतार के रूप में काशी में तपस्या करने वाले महर्षि पतंजलि की तपस्थली नागकूप पर मेला भी गुलजार हुआ और शास्त्रार्थ भी हुआ। मेले में बच्चों ने झूले-चर्खियों पर जमकर मस्ती की। महर्षि पतंजलि काशी में ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में थे।
नागकूप स्थित नागेश्वर महादेव की मंगला आरती के बाद भोर में चार बजे ही आम भक्तों के लिए पट खोल दिए गए। इसी के साथ नागेश्वर महादेव के दरबार में लावा-दूध चढ़ाने के लिए श्रद्धालु उमड़ पड़े। पूजा के बाद रुद्राभिषेक किया गया। दर्शन और अभिषेक के लिए भक्तों की लंबी कतार लगी रही। पुजारी तुलसी पांडेय ने बताया कि सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को कभी सर्प ने इसी नागकूप पर ही डंसा था। नाग पंचमी पर नागकूप के दर्शन से काल सर्प दोष का निवारण हो जाता है।
नागकूप में छलांग लगाने की भी श्रद्धालुओं में होड़ मची रही। उधर, कूप के पीछे मेला गुलजार रहा। झूले-चर्खियों पर तो बच्चों, महिलाओं ने आनंद लिया ही। तरह-तरह के खिलौने, गुब्बारे और नाग देवता के चित्रों की भी दुकानें सजी रहीं। इसके अलावा नागेश्वर महादेव के अन्य मंदिरों में भी श्रद्धालुओं ने दिन भर लावा-दूध का भोग अर्पित किया। उधर पान दरीबा स्थित शिव मंदिर में श्री बरई सभा काशी से जुड़े चौरसिया बंधुओं ने भगवान शिव और नाग देवता की पूजा की। इस मौके पर सभा के अध्यक्ष संतोष चौरसिया, अंजनी समेत अन्य लोग रहे।