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मदर्स डे : दोस्त बनकर बच्चों की जरूरतों और भावनाओं को समझती है मां

Sun, 13 May 2018 03:06 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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मां...। जितना संक्षिप्त शब्द, अर्थ उतना ही विराट। मां ही है जो अपनी औलाद पर कोई मुश्किल आने ही नहीं देती। फिर चाहे मुश्किलों की राह में उसे खुद ही क्यों न चलना पड़े। मातृ दिवस पर हम ऐसी ही माताओं को नमन कर रहे हैं, जिन्होंने खुद अकेले दम पर अपने बच्चों की जिंदगी संवारी। कांटों भरी राह पर खुद चलीं लेकिन बच्चों को इसका एहसास तक नहीं होने दिया।
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हिम्मत की पिटारी बांध आगे बढ़ चलीं

कंचन - फोटो : अमर उजाला
कंचन का संघर्ष एक मां के तौर पर काबिले तारीफ है। पति से अलग होने के बाद अपने बेटे की जिम्मेदारी ही नहीं संभाली, बल्कि एक दोस्त बनकर उसकी जरूरतों और भावनाओं को समझा। शिवाला की रहने वाली कंचन एक संपन्न परिवार की बहू बनकर आईं थीं लेकिन वक्त को कुछ और ही मंजूर था। पारिवारिक मतभेद के चलते शादी के कुछ सालों बाद ही उन्हें मायके वापस आना पड़ा। उनके साथ बेटे को पालने की चिंता थी। कंचन ने हिम्मत नहीं हारी। कभी काम किया नहीं था बावजूद इसके  रामकृष्ट मिशन से जुड़कर उन्होंने काम शुरू किया। आज उनका बेटा कक्षा नौ में है जिसे कभी मां और पिता दोनों का प्यार कंचन ने दिया।

अब भी जारी है जिंदगी से जंग  

शिवानी गुप्ता - फोटो : अमर उजाला
पहले पत्नी और अब मां के तौर पर शिवानी गुप्ता की जिंदगी से जंग जारी है। उम्र से पहले ही इस मां के चेहरे पर झुर्रियां आ गईं हैं जो उनकी कहानी बयां करने को काफी है। पति ज्योति प्रकाश गुप्ता को जिंदगी और मौत की जद्दोजहद से न निकाल पाने की कसक तो जिंदगी भर के लिए है ही, तीन बच्चों की जिम्मेदारी और उनके सपने को पूरा करना अब जिद है। कभी पापा की जिंदगी को बचाने के लिए क्रिकेट छोड़ चुके बेटे शुभम को इस मां ने आज स्पोर्ट्स हॉस्टल भेज दिया है। बेटी सोनाक्षी पिता को किडनी देने को तैयार थी लेकिन पिता बेटी का ये कर्ज ले पाते, उससे पहले ही वो चल बसे। आज भी बच्चों को पालने के लिए ये मां प्लास्टिक और झोले बनाने का काम कर रही हैं। बड़ा बेटा शिवम मां के कामों में ही हाथ बंटाता है।  

बेटा नहीं तो क्या, अपना लीं पांच बेटियां 

पद्मजा शर्मा - फोटो : अमर उजाला
दुर्गाचरण बालिका इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य, डॉ. पद्मजा शर्मा ने मां की एक अलग ही मिसाल पेश की है। 2011 में पहले पति को खोया और तीन साल बाद ठीक उसी दिन उन्होंने अपने बड़े बेटे को खो दिया। उनके मां पिता को तो आज तक इस सच्चाई से दूर रखा गया है। अब अपने छोटे बेटे के सहारे उनकी जिंदगी कट रही है। बड़े बेटे के जाने के बाद उन्होंने पांच बेटियां अपना ली हैं। अपने ही स्कूल में वो उन्हें पढ़ाती हैं, लिखाती हैं और उन्हीं में ही अपने बड़े बेटे का अक्स देखती हैं। 
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मां की मेहनत से बेटी बढ़ चली आगे 

ताहिरा नूर - फोटो : अमर उजाला
यूपी बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में ताहिरा नूर की बेटी काशिफा ने 81 फीसदी अंक हासिल कर मां की मेहनत को बोसा दिया। उसकी आंखों में दोगुनी चमक इसलिए थी क्योंकि उसके सिर पर पिता का साया नहीं है और मां लोगों से लड़कर अपनी बेटी को तालीम दिला रही है। जिंदगी की गाड़ी चलाने को मां सिलाई का काम करती हैं। किसी तरह घर की गाड़ी चल रही है। मां पूरे लगन से बेटी को बैंक में ऑफिसर बनाने का सपना पाले आगे बढ़ रही हैं। 
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