सिकरौरा नरसंहार मामले में 32 साल बाद आया फैसला
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महीने भर में बृजेश को अदालत से दूसरी बड़ी राहत
सिकरौरा नरसंहार मामले में 32 साल बाद आया फैसला
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एमएलसी बृजेश सिंह और उनके समर्थकों के लिए एक महीने के भीतर गुरुवार को दूसरी बार बड़ी राहत मिली। इससे पहले बृजेश सिंह और उनके करीबी त्रिभुवन सिंह को बीते जुलाई महीने के आखिरी हफ्ते में 1991 के गाजीपुर के कुंडेसर चट्टी हत्याकांड में साक्ष्य के अभाव में बरी किया गया था। यह मामला मऊ सदर विधायक मुख्तार अंसारी के भाई पूर्व सांसद अफजाल अंसारी के काफिले पर जानलेवा हमले से जुड़ा था। इसमें तीन लोगों की मौत हो गई थी।
2001 की जुलाई में उसरी चट्टी पर मुख्तार अंसारी के काफिले पर ट्रक सवार बदमाशों ने अंधाधुंध फायरिंग की थी। फायरिंग में मुख्तार के गनर की मौत हो गई थी और हमलावर पक्ष से एक मारा गया था। मुख्तार ने बृजेश सिंह और त्रिभुवन सिंह के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज कराया था। प्रकरण न्यायालय में लंबित है।
फैसले के बाद हर-हर महादेव का उद्घोष
दीवानी कचहरी परिसर में गुरुवार सुबह से ही गहमागहमी का माहौल रहा। सभई फैसले का बेसब्री से इंतजार करते दिखे। लगभग चार बजे बृजेश को सेंट्रल जेल से पुलिस लेकर आई। शाम सवा पांच बजे के लगभग फैसले की जानकारी होते ही बृजेश समर्थकों ने हर-हर महादेव का उद्घोष किया।
सेंट्रल जेल वापसी के दौरान बृजेश शांत लेकिन उत्साहित नजर आए। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर सुबह से देर शाम तक पांच थानोें की फोर्स, क्राइम ब्रांच, पीएसी व स्वॉट टीम के साथ एसपी सिटी दिनेश कुमार सिंह डटे रहे।
चुलबुल की राजनीतिक विरासत संभालेंगे बृजेश
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जिला पंचायत की राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी रहे चुलबुल सिंह की राजनीतिक विरासत को अब बृजेश सिंह संभालेंगे और पूर्वांचल की क्षत्रिय राजनीति के नए केंद्र बिंदु बनेंगे। इस बात की चर्चा दीवानी कचहरी परिसर में गुरुवार को सिकरौरा नरसंहार का फैसला आने के बाद बृजेश समर्थकों, अधिवक्ताओं और वादकारियों के साथ ही पुलिसकर्मियों में भी रही। चर्चाओं के दौरान कहा जा रहा था कि सिकरौरा नरसंहार मामले से राहत मिलने के बाद अन्य मामले भी जल्द ही खत्म हो जाएंगे।
अधिवक्ताओं के पैनल में अबू सलेम के वकील शामिल
मामले में अभियोजन के दावे और आरोप को खारिज करने के लिए बृजेश की ओर से अदालत में अधिवक्ताओं के पैनल ने पैरवी की। इसमें अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम के अधिवक्ता सुदीप पासबोला, शैलेंद्र सिंह, अनिल तिवारी, दीनानाथ सिंह, देवेंद्र प्रताप सिंह, हरिशंकर सिंह, संजय सिंह दाढ़ी, राजा अनंद ज्योति सिंह, वरुण प्रताप सिंह और चेगेवारा गुड्डू शामिल रहे।
1989 में खुली थी हिस्ट्रीशीट, 1998 में पंजीकृत हुई गैंग
एमएलसी बृजेश
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अंतरराज्यीय गैंग नंबर 195 के सरगना एमएलसी बृजेश सिंह पर पुलिस के डोजियर के अनुसार वाराणसी, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, जौनपुर, लखनऊ, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, नई दिल्ली और ओडिशा में 40 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। हालांकि, 2016 के विधान परिषद चुनाव में बृजेश सिंह द्वारा दाखिल हलफनामे के अनुसार उन पर 11 आपराधिक मुकदमे ही दर्ज थे।
इनमें से एक सिकरौरा नरसंहार से उन्हें गुरुवार को बरी कर दिया गया है। बृजेश पर दर्ज आपराधिक मामलों में सिकरौरा नरसंहार ही एक ऐसा प्रकरण है, जिसमें उन्हें गिरफ्तार किया गया।
चौबेपुर थाना अंतर्गत धौरहरा निवासी बृजेश सिंह को 23 जनवरी, 2008 को ओडिशा से दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गिरफ्तार किया था।
बताया जाता है कि पिता रवींद्रनाथ सिंह की हत्या का बदला लेने के लिए अगस्त, 1984 में बृजेश सिंह ने जरायम जगत में कदम रखा। 1985 में बृजेश सिंह पर उनके पिता के हत्यारोपी हरिहर सिंह की हत्या का आरोप लगा। इसके बाद पूर्वांचल सहित प्रदेश ही देश के अन्य राज्यों में बृजेेश का नाम चर्चित हो गया। इसी बीच 1989 में बृजेश की हिस्ट्रीशीट खुली और 1998 में गैंग पंजीकृत की गई।
पुलिस डोजियर के अनुसार बृजेश गिरोह के सदस्य मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में शरण लेते थे। गिरोह एके-47, स्टेनगन, राइफल और नाइन एमएम की पिस्टल जैसे अत्याधुनिक असलहों से लैस था। गिरोह के मौजूदा सदस्य के तौर पर आठ लोग और आश्रयदाताओं के तौर पर 14 लोग पुलिस के डोजियर में सूचीबद्ध हैं।
वादिनी के बयान को कोर्ट ने बताया अविश्वसनीय
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सिकरौरा नरसंहार मामले की वजह जमीन संबंधी विवाद और ग्राम प्रधान चुनाव की रंजिश बताई गई थी। प्रधान रामचंद्र यादव की पत्नी हीरावती देवी की तहरीर पर मुकदमा दर्ज किया गया था। मामले में आरोपी बृजेश सिंह को नामजद नहीं किया गया था। प्राथमिकी दर्ज कराने के समय और बयान में अदालत ने भिन्नता पाई।
अदालत में डॉक्टर ने बयान दिया कि जिस गड़ासा की बात कही गई है, उससे हत्या नहीं हो सकती बल्कि बल्लमनुमा हथियार की चोट मृतकों के शरीर पर पाई गई थी। वादिनी ने पूर्व के बयान में कहा था कि उसने सीढ़ी से उतरते हुए पंचम और देवेंद्र को देखा था। वहीं, बाद के बयान में कहा कि सीढ़ी से पंचम और बृजेश को उतरते देखा था। इस वजह से अदालत ने वादिनी के बयान को अविश्वसनीय माना।
इस प्रकरण के छह आरोपी पहले ही बरी किए जा चुके हैं। 2008 में बृजेश की गिरफ्तारी के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर मामले की त्वरित सुनवाई जिले की अदालत में शुरू हुई। शुरुआत में मामला वारदात के समय बृजेश के बालिग और नाबालिग होने को लेकर अटका रहा।
वारदात के दौरान बृजेश के बालिग घोषित होने पर विचारण शुरू हुआ। गुरुवार को अदालत के फैसले के बाद कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में बृजेश को लेकर पुलिस वापस सेंट्रल जेल चली गई। दूसरी ओर वरिष्ठ जेल अधीक्षक अंबरीष गौड़ ने बताया कि फिलहाल बृजेश को जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा।