वाराणसी। बिना परखे आप दूध पी रहे हैं तो सावधान हो जाइए। जरूरी नहीं कि यह दूध आपको सेहतमंद बनाए। दरअसल, खाद्य नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के सर्वे में पैकेज्ड दूध और कच्चे दूध के नमूने निर्धारित गुणवत्ता व मानक पर खरे नहीं पाए गए हैं। शहर की स्थिति भी इससे अलग नहीं है।
शहर में प्रतिदिन 95 हजार से एक लाख लीटर दूध की खपत होती है। इसमें 40-45 हजार लीटर दूध खुले बाजार से आता है और बाकी दूध डेयरियों से आता है। अब त्योहारों को देखते हुए मिठाइयां तैयार होने लगी हैं और दूध की मांग भी बढ़ गई है। ऐसे में मिलावटखोर भी सक्रिय हो गए हैं। जरूरत है सही और मिलावटी दूध पहचानने की, ताकि नुकसान से बचा जा सके।
ऐसे की जाती है मिलावट
जानकार बताते हैं कि दूध को सफेद बनाए रखने के लिए साबुन व डिटर्जेंट जैसे हानिकारक केमिकल्स मिलाए जाते हैं। झाग के लिए यूरिया फेंटा जाता है। दूध को गाढ़ा बनाने के लिए तेखुर और सिंघाड़े के आटे का घोल मिलाया जाता है। दूध खराब न हो, इसके लिए कीटनाशक मिलाया जाता है। फैट के लिए रिफाइंड ऑयल तो मिठास के लिए ग्लूकोज मिलाया जाता है। एक लीटर सिंथेटिक दूध तैयार करने में 15 से 18 रुपये की लागत आती है, जबकि यही दूध 30 से 40 रुपये लीटर तक बिकता है।
रोहनिया में पकड़ा गया था प्लांट
खाद्य विभाग ने रोहनिया क्षेत्र में डेयरी प्लांट प्योर डेयरी सॉल्यूशंस से 10 हजार लीटर से ज्यादा नकली दूध बरामद किया था। यहां दूध में डिटर्जेंट मिलाया गया था। यह दूध काशी संयोग नाम से बेचा जा रहा था। इसके अलावा पिछले एक साल में दूध की कोई और सैंपलिंग नहीं की गई।
ऐसे पहचानें मिलावटी दूध
पानी : लकड़ी या पत्थर पर दूध की बूंद गिराइए, अगर वह बहकर नीचे आ जाए और सफेद निशान बने तो वह शुद्ध है।
डिटर्जेंट: दूध को कांच की शीशी में लें। जोर से हिलाने पर झाग बने तो इसका मतलब दूध में डिटरर्जेंट मिला है। अगर झाग देर तक बना रहे तो दूध के नकली होने में कोई संशय नहीं है। दूध को सूंघकर देखें। अगर दूध नकली है, तो उसमें साबुन की तरह गंध आएगी।
ऑयल्स : दूध को दोनों हथेलियों पर लेकर रगड़ें। अगर दूध असली है तो सामान्य तौर पर चिकनाहट महसूस नहीं होगी। अगर दूध नकली है तो चिकनाहट महसूस होगी।
सिंथेटिक दूध : असली दूध देर तक रखने पर भी रंग नहीं बदलता है। जबकि नकली दूध कुछ समय बाद पीला पड़ने लगेगा। ऐसी स्थिति गरम करने पर भी होती है। अगर यूरिया मिला हुआ है तो दूध गाढ़े पीले रंग का हो जाता है।
सोडा: असली दूध हल्का मीठा होता है, जबकि नकली दूध का स्वाद डिटर्जेंट और सोडा मिला होने की वजह से कड़वा हो जाता है।
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खाद्य सुरक्षा विभाग को सैंपलिंग के निर्देश दिए गए हैं। इसमें किसी तरह की लापरवाही पर कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। किसी के पास शिकायत हो तो वह सीधे मुझे अवगत करा सकता है। -विनय कुमार, अपर जिलाधिकारी नगर
किडनी और लिवर खराब होने का खतरा
मिलावटी दूध का सीधा असर किडनी और लिवर पर पड़ता है। सावधानी नहीं बरतने पर लिवर में संक्रमण और किडनी फेल होने का खतरा अधिक रहता है। दूध पीने से शरीर को कैल्शियम मिलता है, लेकिन सिंथेटिक दूध के सेवन से हड्डियों पर गलत असर पड़ता है। -डॉ. पीके सिंह, फिजिशियन, दीनदयाल अस्पताल