काशी विश्वनाथ को लगी लगन की हल्दी
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‘अर्धांग भस्म भभूत सोहे अर्ध मोहिनी रूप...’ पर नृत्य प्रस्तुत किया। ‘हे शिव शंकर हे गंगा धर करुणाकर...’, के बोल पर पारंपरिक कथक नृत्य हुआ। समापन होली कैसी ये धूम मचाई बिरज में... से किया। महिलाओं की टोली ने लोकगीत ‘दूल्हा के देहीं से भस्मी छोड़ावा सखी हरदी लगावा ना...’, शिव दूल्हा के माथे पर सोहे चनरमा...’, ‘अड़भंगी क चोला उतार शिव दूल्हा बना जिम्मेदार’ और ‘भोले के हरदी लगावा देहिया सुंदर बनावा सखी...’ आदि हल्दी के पारंपरिक शिवगीतों में दूल्हे की खूबियों का बखान किया गया।
मंगल गीतों में यह चर्चा भी की गई कि विवाह के लिए तैयारियां कैसे की जा रही हैं। नंदी, सृंगी, भृंगी आदि गण नाच नाच कर सारा काम कर रहे हैं। शिव का सेहरा और पार्वती की मौरी कैसे तैयार की जा रही है। हल्दी की रस्म के बाद नजर उतारने के लिए ‘साठी क चाऊर चूमिय चूमिय..’ गीत गाकर महिलाओं ने भगवान शिव की रजत मूर्ति को चावल से चूमा। हल्दी-तेल पूजन पं. सुशील त्रिपाठी के आचार्यत्व में हुआ।