परंपराओं के शहर बनारस की हर बात निराली है। मंदिरों के शहर में हर मंदिर की कहानी अलग-अलग है। बात जब बाबा विश्वनाथ की आती है तो फिर तो हर मुंह से हर-हर महादेव और दोनों हाथ अभिवादन में खुद ब खुद उठ जाते हैं। मंदिर से जुड़ी अपनी परंपराएं हैं और आज भी उनको उसी शिद्दत के साथ निभा रहा है महंत परिवार।
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बाबा विश्वनाथ के गौने की बरात की परंपरा का निर्वहन 1669 से महंत परिवार करता आ रहा है। महंत परिवार के डॉ. कुलपति तिवारी फिलहाल 30 सालों से इस परंपरा को बनाए हुए हैं। डॉ. तिवारी ने बताया कि गौना बरात की परंपरा 354 सालों से उनके परिवार में चल रही है। बरात के लिए बाबा की पगड़ी बनाने का काम गयासुद्दीन और नंदलाल का परिवार कई पीढि़यों से करता आ रहा है। महंत आवास से रंगभरी एकादशी पर निकलने वाली गौने की बरात में बाबा को गुलाल चढ़ाने के लिए काशीवासियों का रेला उमड़ता है। महंत आवास पर तिलक और विवाह की रस्मों के बाद रंगभरी एकादशी पर गौने की बरात निकलती है। बाबा विश्वनाथ चांदी की पालकी पर सवार होकर काशी की गलियों में भक्तों को दर्शन देने के लिए निकलते हैं।