महालक्ष्मी आली घरात सोन्याच्या पायानी, भरभराटी घेऊन आली... अर्थात माता-लक्ष्मी सपरिवार हमारे घर आएं, घरों में सुख और संपन्नता लेकर आएं, सदैव उनका वास बना रहे। इन्हीं मनोकामनाओं के साथ मां लक्ष्मी अपनी छोटी बहन अलक्ष्मी के साथ महाराष्ट्रीयन घरों में पधारीं। गणेश के साथ ही लक्ष्मी पूजन का तीन दिवसीय उत्सव भी आरंभ हो गया।
सात वार नौ त्योहार वाली काशी में महाराष्ट्रीयन परिवारों में भाद्र शुक्ल अष्टमी से महालक्ष्मी उत्सव शुरू हुआ। महालक्ष्मी व्रत का शुभारंभ प्रात:काल में स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेने से हुआ। माता की पूजन सामग्री में चंदन, ताल पत्र (ताड़ के वृक्ष का पत्ता), पुष्पमाला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल तथा 16 प्रकार के भोग अर्पित किए गए। इससे पूर्व श्रीलक्ष्मी को पंचामृत से स्नान कराया गया। पूजन करके व्रत रखने वालों ने 4 ब्राह्मण और 16 ब्राह्मणियों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा भी दी।
घरों में होने वाले आयोजन के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का खास ध्यान रखा गया। धन की देवी मां लक्ष्मी और उनकी बहन अलक्षमी का पूजन विधि विधान से किया गया। महाराष्ट्रीयन समाज के प्रदीप पाठक ने बताया कि नवमी के दिन माता का विसर्जन किया जाएगा। इस दिन माता को दही-भात का भोग लगाया जाएगा। इसके बाद माता की विदाई के लिए पहले उनकी ओटी (गोद) भराई की रस्म होगी। ओटी भराई होने के बाद विसर्जन किया जाएगा।