पंच परमेश्वर की संस्तुति के बाद इष्टदेव पूजन होता है। मुंडन, गंगा स्नान, पितरों का श्राद्ध व खुद का पिंडदान किया जाता है। देवी-देवता का स्मरण कर जनेऊ व दंड धारण, विजया हवन होता है। रात में गंगा में दंड व जनेऊ विसर्जन के बाद महामंडलेश्वर उन्हें दीक्षा देते हैं। इस दौरान 24 घंटे व्रत रखा जाता है। शरीर पर भगवान शिव का अखंड भस्म लगाते हैं। 24 घंटे महावाक्य का जप करते हैं। इसके बाद रुढाथ की कंठी धारण कराई जाती है।
अखाड़े करते हैं पते की तस्दीक
अब संन्यासी जीवन धारण करवाने के लिए आधार देखा जाता है। अखाड़े उनके नाम पत्ता आदि की तस्दीक करने के बाद ही उन्हें दीक्ष देते हैं। बटेश्वर भारती महाराज ने बताक उनके नाम व फछ सही नहीं पाया गया और वह गलत प्रकृति का है तो उसे सन्यास धारण नहीं कराते।