चित्रकूट से भरत के विदा होने की लीला ने गुरुवार को मेले का रूप ले लिया। रामबाग पोखरा से लगे इलाके की चमक-दमक देखते बनी। सिर राम की खड़ाऊं रखकर भरत ने चित्रकूट से जब अयोध्या के लिए प्रस्थान किया तब हजारों लीला प्रेमियों का हुजूम उनके पीछे चल पड़ा। आगे-आगे भरत-शत्रुघ्न और उनके पीछे हाथी पर सवार राजा और पारंपरिक वेश में लीला प्रेमी, रामायणी चले।
भरत सील गुर सचिव समाजू/सकुच सनेह बिबस रघुराजू/प्रभु करि कृपा पांवरी दीन्हीं/सादर भरत शीश धरि लीन्हीं/चरनपीठ करुनानिधान के/जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के/संपुट भरत सनेह रतन के/आखर जुग जनु जीव जतन केप्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई/चले सीस धरि राम रजाईजथा जोगु करि बिनय प्रनामा/बिदा किए सब सानुज रामा...। लीला की शुरुआत होती है राम के आगे भरत के संवाद से। वह कहते हैं कि आपके तिलक के लिए सभी तीर्थों का जल लेकर आया हूं। इसके लिए आज्ञा दीजिए।
इस दौरान भरत चित्रकूट दर्शन की इच्छा व्यक्त करते हैं। पांच दिन तक चित्रकूट भ्रमण के बाद भरत ने राम से कहा कि अयोध्यावासी बहुत कष्ट में है। आप राजपाट स्वीकार कर उनका दुख दूर कीजिए। राम उनको समझाते हैं। भरत की जिद पर राम संकुचाते हुए भरत को अपनी खड़ाऊं दे देते हैं। भरत ने भगवान राम के दोनों खड़ाऊं सिर पर ऐसे धारण किया जैसे, वह अयोध्या की प्रजा के प्राणों की रक्षा के लिए दो पहरेदार हों। चित्रकूट में उत्सवी छटा के बीच सिर पर भगवान की खड़ाऊं रखकर भरत, शत्रुघ्न चले तो उनके पीछे कारवां चल पड़ा। हाथी पर सवार काशिराज अनंत नारायण सिंह के पीछे लीलाप्रेमियों के समूह चल रहे थे। भरत पुरजन सहित किलारोड स्थित अयोध्या आ जाते हैं। जनक अवध में रहकर चार दिन तक राजकाज समझा कर तिरहुत चले जाते हैं। इसके बाद मेहताबी रोशनी में भगवान राम की आरती होती है। गुरु वशिष्ठ का आशीर्वाद लेकर वह ज्योतिषियों के साथ सिंहासन पर राम की चरण पादुका स्थापित कर माताओं की आज्ञा लेकर नंदी ग्राम में पर्णकुटी बनाकर रहने लगते हैं।