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महामना और बीएचयू से गहरा नाता था बापू का

Fri, 30 Sep 2016 01:14 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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परस्पर गहरा संबंध, प्रेम, स्नेह और सम्मान भाव...। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के बीच रिश्ते का नाम यही था। बावजूद इसके उनके बीच कई मुद्दों पर वैचारिक मतभेद भी रहे, ये भी किसी से छिपा नहीं। व्यक्तिगत मुलाकात से लेकर सामूहिक स्तर पर इसे उन्होंने हमेशा खुलकर जाहिर किया था लेकिन खासियत यही थी कि ये वैचारिक मतभेद कभी रिश्तों के आड़े नहीं आया। जीवन के अंतिम समय तक दोनों ने वो रिश्ता पूरे मान-सम्मान के साथ निभाया। यही वजह थी कि महात्मा गांधी का बीएचयू से गहरा जुड़ाव भी रहा। शिलान्यास समारोह से लेकर विश्वविद्यालय की रजत जयंती पर उन्होंने यहां शिरकत की।
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जिस वक्त काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, भारत आजादी मांग रहा था। चार फरवरी, 1916 को विश्वविद्यालय का शिलान्यास हुआ। इस क्रम में तीसरे दिन छह फरवरी, 1916 को महात्मा गांधी बीएचयू आए। सेंट्रल हिंदू कॉलेज में उनका व्याख्यान हुआ। उन्होंने महामना की इस राष्ट्रवादी कोशिश को सराहा और भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। इसके बाद बापू 1920 में विश्वविद्यालय आए। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ चल रहे आंदोलन में महात्मा गांधी छात्रों की सहभागिता चाहते थे।


इस दौरान सेंट्रल हिंदू कॉलेज कमच्छा में गांधी जी की सभा हुई। गांधी जी ने विद्यार्थियों को कॉलेज बहिष्कार का संदेश दिया लेकिन महामना इसके खिलाफ थे। विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करें, वह इसके पक्षधर थे। इसी तरह असहयोग आंदोलन को लेकर भी दोनों में मतभेद रहा। चौरीचौरा कांड के बाद ये महामना ही थे, जिनके चलते गांधी जी ने 1922 में शुरू करने वाले सत्याग्रह आंदोलन को अपनी भूल मानते हुए उसे स्थगित कर दिया। तीसरी बार गांधी जी ने विश्वविद्यालय के रजत जयंती के तहत दीक्षांत समारोह में 21 जनवरी, 1942 में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की।
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विश्वविद्यालय के रजत जयंती समारोह के दौरान गांधी जी ने विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर अंग्रेजी में लिखे बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी पर एतराज जताया था। कहा कि मुख्य द्वार पर हिंदी में काशी हिंदू विश्वविद्यालय बड़े ही छोटे शब्दों में लिखा है, जबकि अंग्रेजी में तीन चौथाई हिस्से ने जगह घेर रखी है। आखिर यहां अंग्रेजी की क्या जरूरत थी। हालांकि ये सभी जानते थे कि उस दौर में अंग्रेज विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय आंदोलन का गढ़ मानते थे इसलिए महामना ने धैर्य से काम लिया और सिंह द्वार पर अंग्रेजी में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी नाम अंकित होने दिया। बाद में इसे हिंदी में कर दिया गया।
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