स्वर्ण जड़ित अरघे के लिए लेना पड़ा था छह लाख रुपये का ऋण
एक फरवरी 1983 को वाराणसी के तत्कालीन मंडलायुक्त शैवाल मुखर्जी ने यूपी के मुख्य सचिव को पत्र लिखा था। मंडलायुक्त ने कहा था कि श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के स्वर्ण जड़ित अरघे को शिवरात्रि से पहले बनवाना जरूरी है। श्रद्धालुओं में गुस्सा है। श्रद्धालुओं का विश्वास जीतने के लिए अरघे को स्वर्ण जड़ित कराना ही होगा। इसके लिए छह लाख रुपये की जरूरत है। उन्होंने आरबीआई को पत्र लिखने और ऋण लेने का सुझाव भी दिया था। इस पर तत्कालीन मुख्य सचिव ने मामले को आगे बढ़ाया। पांच जनवरी से पुलिस की जांच तेज हो गई थी।
25 जनवरी 1983 को अमर उजाला में छपी खबर
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चोरी के 21 दिन बाद मंदिर का अधिग्रहण, न्यास परिषद के अध्यक्ष बनाए गए काशी नरेश
4 जनवरी 1983 में हुई चोरी के 21 दिन बाद यानी 25 जनवरी को ही तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने बड़ा फैसला लिया था। सरकार ने अध्यादेश जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर का अधिग्रहण कर लिया था। साथ ही मंदिर के संचालन की नई व्यवस्था लागू कर दी थी। तीन स्तरीय प्रबंधन का प्रावधान किया गया था। इनमें एक न्यासी परिषद, एक कार्यकारिणी समिति और एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी का प्रावधान शामिल था। पहला न्यास अध्यक्ष काशी नरेश विभूति नारायण सिंह का बनाया गया था। शृंगेरी के शंकराचार्य, सांस्कृतिक, वित्त, समाज कल्याण विभाग, न्यायिक विभाग के सचिव, सांस्कृतिक कार्य निदेशक, डीएम, मंडलायुक्त, संपूर्णानंद संस्कृत विवि के कुलपति को सदस्य बनाया गया था।
1983 में तो चोरी हुई ही थी। 70 के दशक में भी चोरी हुई थी। पुलिस पड़ताल में कोई एक व्यक्ति पकड़ा भी गया था। इस तरह की घटनाएं सार्वजनिक स्थानों पर न हों इसके लिए सरकारी तंत्र काम करता है। करना भी चाहिए इसीलिए काशी विश्वनाथ में 1983 में जब बड़ी चोरी हुई तो प्राथमिकी दर्ज की गई। संतों और जनता की नाराजगी बढ़ी तो सरकार ने मंदिर के अधिग्रहण की घोषणा कर दी। बाकी काम, क्रोध, लोभ और मोह तो इंसानी प्रवृत्ति है चाहे वह सामान्य आदमी हो या किसी बड़े पद पर बैठा कोई भी विशिष्ट व्यक्ति इसीलिए निगरानी तंत्र को हमेशा सक्रिय रहना चाहिए। -प्रो. नागेंद्र पांडेय, पूर्व अध्यक्ष, काशी विश्वनाथ न्यास