महाकवि सुब्रह्मण्यम भारती की प्रतिमा को नमन करते केंद्रीय मंत्री
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हाल ही में भाषा समिति ने 11 दिसंबर की तारीख को भारतीय भाषा दिवस या भारतीय भाषा उत्सव के रूप में प्रस्तावित किया था। इसके बाद यूजीसी ने सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को 11 दिसंबर को ‘भारतीय भाषा दिवस’ मनाने का निर्देश दिया। ये संस्थान अपने पड़ोसी संस्थानों/महाविद्यालयों/विद्यालयों के छात्रों को भी उत्सव में आमंत्रित कर सकते हैं।जिसके उद्देश्य निम्न हैं।
- - विद्यार्थियों को भारतीय भाषाओं के बारे में जानकारी देना।
- - लोगों को कुछ और भारतीय भाषाएं सीखने के लिए प्रोत्साहित करना।
- - संस्कृति, कला आदि में विविधता का उत्सव मनाने के लिए और लोगों को भारतीय भाषाओं के माध्यम से राष्ट्रीय एकता, सद्भाव और अखंडता का अनुभव कराना।
- - यह दिखाना कि भाषा सीखना कैसे एक मनोरंजक आनंनदायी अनुभव हो सकता है।
- - राष्ट्र के विकास और 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' के लक्ष्य को साकार करने के लिए भारतीय भाषाओं की आवश्यता को रेखांकित करना।
महाकवि सुब्रह्मण्यम भारती के भांजे प्रो. केवी कृष्णन के घर पहुंचे केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान
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भाषा समिति ने 11 दिसंबर की तारीख को ‘भारतीय भाषा दिवस’ या ‘भारतीय भाषा उत्सव’ के रूप में प्रस्तावित किया, क्योंकि ये दिन आधुनिक तमिल कविताओं के अग्रणी कवि सुब्रह्मण्यम भारती की जयंती का प्रतीक है।
महाकवि सुब्रह्मण्यम ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशभक्ति को प्रोत्साहित करने के लिए गीत लिखे थे। बहुभाषावाद को मजबूत करने के लिए, लोगों को अधिक भाषाएं सीखने के लिए प्रोत्साहित करने और लोगों को विविधता में एकता का अनुभव कराने के लिए, भारतीय भाषा दिवस मनाने और इसे भारतीय भाषा उत्सव के रूप में मनाने की सिफारिश की गई।
काशी तमिल संगमम की होर्डिंग
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कण-कण शंकर की नगरी काशी अपनी ऊर्जा से हर किसी को ऊर्जित करती है। 129 साल पहले काशी ने सुब्रह्मण्यम भारती में देशप्रेम का प्रकाश भरा था। बनारस की मिट्टी की देन थी जिसने सुब्रह्मण्यम भारती में राष्ट्रीय चेतना की शिक्षा और संस्कार से सजाया। साथ ही तमिल के राष्ट्रकवि के पद पर सुशोभित किया। वंदेमातरम का तमिल में किया हुआ पद्मानुवाद तो हर तमिल वासी के दिल में बसता है।
स्वराज्य, स्वभाषा तथा स्वदेशी के प्रबल समर्थक राष्ट्रप्रेमी कवि सुब्रह्मण्यम भारती ने तमिलनाडु में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया। तमिल के राष्ट्रकवि के भांजे और बीएचयू से सेवानिवृत्त प्रो. केवी कृष्णन (97) ने बताया कि बचपन में ही मातृ विहीन और पितृ विहीन होने के दुख को मामा ने काव्य में उकेर दिया।
11 वर्ष की अवस्था में ही उनकी काव्य प्रतिभा से प्रभावित होकर स्थानीय सामंत के दरबार में भारती की उपाधि से सम्मानित किया गया था। वह शिक्षा के उद्देश्य से काशी आए थे और जब लौटे तो तमिल समुदाय के राष्ट्रकवि के रूप में स्थापित हुए। काशीवास के दौरान भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा निर्मित हरिश्चंद्र मंडल का भी उनके ऊपर काफी प्रभाव था।
प्रो. कृष्णन ने बताया कि 1905 में जब कांग्रेस अधिवेशन के दौरान सरला देवी की आवाज में उन्होंने पहली बार वंदेमातरम सुना तो वह उनका जीवन प्राण ही बन गया था। मद्रास लौटकर सुब्रह्मण्यम भारती ने वंदेमातरम का उसी लय में पद्मानुवाद किया। आज यह तमिलनाडु के घर-घर में गूंजता है। भाषा भले ही हिंदी भाषी लोगों को ना समझ आए लेकिन लय तो एकदम वही है।