जापान से बनारस के रिश्तों की बात करें तो अपनेपन की गहराईयां सोचने के लिए विवश कर देती हैं। करीब 35 वर्षों के दौरान प्यार के रिश्ते इस कदर परवान चढ़े कि बनारस के कई मुहल्लों की गलियां अब जापानियों की अपनी हो गई हैं। उन्हीं गलियों की लकड़ी की बेंच और चाय की दूकानों पर अड़ी बनाकर वह दिन भर चाय की चुस्कियां लेते नजर आते हैं तो शाम को संगीत का आनंद भी।
अब तो पांडेय घाट, खालिसपुरा, बंगालीटोला की गलियों में इश्तेहार भी जापानी भाषा में ही चस्पा किए जाने लगे हैं। रेस्टूरेंट हों आर्टिफिशियल ज्वेलरी या फिर परिधानों की दूकानें, वहां के साइन बोर्ड और वस्तुओं की रेट लिस्ट भी जापानी में ही मिलेगी। कुछ घरों में तो खून के रिश्ते की कड़ी अब तीसरी पीढ़ी तक जा पहुंची है। इन्हीं रिश्तों में से एक नायाब जोड़ी है कुमिको और शांतिरंजन गंगोपाध्याय की। इस रिश्ते की शुरुआत 1975 में तब हुई जब कवि और चित्रकार शांतिरंजन जापान यात्रा पर गए थे। वहां टोक्यो में उनकी मुलाकात एक रेस्टूरेंट में कुमिको से हो गई। पहली मुलाकात में ही बनारसी अंदाज से कुमिको इस तरह जुड़ीं कि फिर खुद को अलग न कर सकीं। वहीं दोनों ने शादी की और फिर बनारस आ गए।
कुमिको बताती हैं कि इसके बाद एक बार वह टोक्यो गईं थीं। फिर इन्हीं गलियों से उनका जीवन भर का लगाव बन गया। कुमिको ने एक पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम शांतिरंजन ने सौम्य गंगोपाध्याय रखा मगर कुमिको उसे जापानी अंदाज में सोमियो कहकर बुलाने लगीं और अब उसे लोग सोमियो के नाम से ही जानते हैं। कुमिको के नाम से ही रेस्टूरेंट चलाने वाले सोमियो की बेटी स्नेहा अब दो साल की हो गई है।
कुमिको शिंदे के काशी आगमन की खबर से बहुत खुश दिखीं। कहा, मौका मिलेगा तो वह उनसे मिलकर खुशी जाहिर करेंगी। इसी तरह, जापान के कोबे शहर की मेगूमी हिसादा का दिल कभी संजय साहनी पर आ गया आैर दोनों ने शादी रचा ली। मेगुमी विश्वनाथ गली में रेस्टूरेंट चला रही हैं। जापानी पीएम के आगमन को लेकर होने वाली तैयारियों की बैठक में भी बुधवार को उन्होंने हिस्सा लिया। वह कहती हैं कि खामोड़िबा नदी के किनारे बसे प्राचीन शहर क्योटो से कुछ हद तक मिलता-जुलता गंगा का किनारा उन्हें खींचता है तो हिंदू-बौद्ध धर्म की समानताएं भी दोनों देशों के लोगों की करीब खड़ा करती हैं। इसी तरह हिरोशिमा की सयाका, शाओबो शहर की मिहो और होख्थाडो की काना ने इसी शहर में शादी करके गृहस्थी बसा ली है।