इस शहर पर बहुत कुछ लिखा गया, लेकिन जिस बात पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई, वह है काशी की सांप्रदायिक शून्यता। यह परंपरा काफी हद तक आज भी सुरक्षित है। तीन दशक पहले जब शहर में तनाव का माहौल बना था, तब काशी का बौद्धिक वर्ग सड़कों पर उतर आया था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति से लेकर हजारों प्रोफेसर और छात्र मालवीय भवन से टाउनहॉल तक पदयात्रा करते हुए धरने पर बैठे थे और तनाव को शहर से बाहर कर दिया था।
वह सामाजिक चेतना और एकजुटता आज बहुत याद आती है। काशी के पुराने वाशिंदे शहर की बदलती परंपराओं, रहन-सहन और दिनचर्या को लेकर मुखर जरूर हैं, लेकिन यह भी सच है कि भागती तकनीक, बढ़ता अर्थतंत्र और बदलता परिवेश कुछ नैतिक और सांस्कृतिक परंपराओं को प्रभावित करेगा। चुनौती यही है कि विकास और विरासत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। - डॉ. विश्वनाथ पांडेय, पूर्व विशेष कार्याधिकारी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय