काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि शास्त्रों में कहा गया है कि कार्तिक के समान दूसरा कोई मास नहीं है, सतयुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। वर्ष के द्वादश मास में कार्तिक मास को ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला माना गया है।
भगवान विष्णु और भगवती लक्ष्मी को समर्पित कार्तिक मास में पंचगंगा का स्नान और दीपदान होगा। कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी पर देवता जागृत होते हैं। सनातन धर्म में उत्सवों की शृंखला की शुरुआत भी कार्तिक मास में ही होती है। कार्तिक मास के यम नियम, व्रत और संयम 29 अक्तूबर से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा 27 नवंबर तक रहेंगे।
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काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि शास्त्रों में कहा गया है कि कार्तिक के समान दूसरा कोई मास नहीं है, सतयुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। वर्ष के द्वादश मास में कार्तिक मास को ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला माना गया है। स्कंदपुराण के अनुसार यह मास लक्ष्मी प्रदाता, सदबुद्धिदायक एवं आरोग्य देने वाला कहा गया है। इस मास में यमदेव को प्रसन्न करने के लिए आकाशदीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं। मास पर्यंत आंवले के वृक्ष को सींचना व पूजन लाभदायक होता है। काला तिल एवं आंवले का चूर्ण लगाकर स्नान करने से सभी पापों का शमन होता है।
नहीं करेंगे इस मास में ग्रहण
कार्तिक मास में व्रत करने वाले और साधकों को अपने परिवार के अलावा किसी दूसरे का कुछ भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। चना, मटर, उड़द, मूंग, मसूर, राई, लौकी, गाजर, बैंगन और बासी अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही लहसुन, प्याज और तेल का उपयोग नहीं करना चाहिए। शरीर में तेल नहीं लगाना चाहिए। कार्तिक मास की द्वितीया, सप्तमी, नवमी, दशमी, त्रयोदशी व अमावस्या तिथि के दिन तिल व आंवले का प्रयोग नहीं करना चाहिए। कार्तिक मास में स्नान व व्रत करने वालों को केवल कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन ही तेल लगाना चाहिए। फटे व गंदे वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि इस माह में भगवान विष्णु की महिमा में व्रत रखने पर ग्रहजनित दोषों से मुक्ति मिलती है तथा संकट का निवारण होता है।
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कार्तिक मास में क्या करें
कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। भूमि पर शयन करें। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान व ध्यान करें। गंगाजी में कमर तक जल में खड़े होकर पूर्ण स्नान करें। सात्विक भोजन करें। भगवान विष्णु की आराधना करें। पीपल वृक्ष व तुलसीजी के पौधे की धूप-दीप से पूजा करें।