प्राकट्य स्थल पर सत्संग का आयोजन हुआ। महंत विवेक दास ने कहा कि कबीर प्राकट्य स्थल हमारे लिए तीर्थ समान है। कबीर साहब ने अपने अंतिम समय में काशी की बजाय मगहर को चुना। इसके पीछे यही उद्देश्य था कि लोग इस बात को समझ जाएं कि मुक्ति के लिए स्थान नहीं कर्म की पवित्रता व भक्ति का भाव महत्वपूर्ण है। जोधपुर के महंत रामदास ने कहा कि कबीर साहब हमें जीते जी मुक्ति पाने का तरीका बताते हैं। तानाबाना ग्रुप के सदस्यों ने भजनों की प्रस्तुति दी। इस दौरान गोविंद दास शास्त्री, प्रेमदास, देवशरण दास, प्रमोद दास, देवेंद्र दास, कृष्णा व गौरव मौजूद रहे।
संत और संगीत का संगम हैं कबीरचौरा महोत्सव
कबीरचौरा महोत्सव कबीरमठ के आसपास रहने वाले कलाकारों के सम्मान में आयोजित होता है। स्वकर्म संस्थान के सचिव डॉ. रविंद्र सहाय कैलाशी ने बताया कि कबीरचौरा महोत्सव में महान संत कबीर साहब और कला की तीनों विधा का मिलन होता है। 23 फरवरी को कबीरचौरा महोत्सव का उद्घाटन और पद्मश्री सितारा देवी की पुत्री जयंती माला का कथक नृत्य, कटनी के कबीर भजन गायक चंदूलाल कबीर और सुखदेव मिश्र जी का पंचनाद होगा। 24 फरवरी को रेवती सावलकर का गायन और प्रशस्ति तिवारी का कबीर नृत्य होगा।