यह काशी के इकलौते भगवान हैं जो वर्ष के चार दिनों में अलग-अलग तीन वाहन पर सवार होते हैं। डोली और रथ पर विराजमान भगवान के दर्शन तो हर कोई करता है लेकिन कार में सवार भगवान के दर्शन किसी को नहीं होते। मध्यरात्रि के बाद अपने नियत समय पर भगवान को रथ से उतारकर कार में विराजमान कराया जाता है। इसके बाद कार सीधे मंदिर परिसर में ही पहुंचकर रुकती है। इसके समय के बारे में सिर्फ और सिर्फ पुजारी व ट्रस्ट के पदाधिकारियों को ही पता होता है।
ट्रस्ट श्री जगन्नाथ के दीपक शापुरी ने बताया कि 2010 तक भगवान डोली पर सवार होकर निकलते थे, रथ पर विराजमान होकर दर्शन देते थे और फिर वापस डोली से अपने मंदिर में लौट जाते थे। इसके बाद रात में डोली उठाने वालों की किल्लत हो गई तो फिर इसमें बदलाव करना पड़ा।
स्वस्थ होने के बाद भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र जब काशी की गलियों में निकलते हैं तो डोली उठाने वालों की होड़ सी लग जाती है लेकिन रात के समय ना तो भक्त होते हैं और ना ही कोई डोली उठाने वाला। इसको देखते हुए बदलते समय के साथ परंपराओं में थोड़ा सा बदलाव करना पड़ा। पिछले 14 सालों से भगवान को कार में विराजमान कराकर मंदिर वापस लाया जाता है। इस दौरान मंदिर के पुजारी और चालक के अलावा कोई तीसरा व्यक्ति मौजूद नहीं होता है।