दुर्गाकुंड वृद्धा आश्रम महिलाए आपस में बातचीत करती हुई
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वक्त बदल गया, अब अंगुली पकड़ कर चलना और पहला अक्षर सिखाने वाली माताएं वृद्धाश्रम में अपने दर्द भरे दिन काट रही हैं। मां इस एक शब्द में कितनी गहराई छिपी है, इसकी व्याख्या भी नहीं की जा सकती है।
भारतीय परंपरा में मां का स्थान भगवान से भी ऊपर है लेकिन वक्त के साथ हम भारतीय भी पाश्चात्य संस्क़ृति में ढलते जा रहे हैं। एकल परिवार आज वक्त का तकाजा भी बन गई है। शायद यही वजह है कि यहां भी वृद्धाश्रम की संख्या बढ़ रही है।
माताएं अब घर की मुखिया नहीं, अब तो उनका ठिकाना वृद्धाश्रम है जहां इनकी सूनी आंखें अपनों का पता ढूंढती नजर आती हैं। मोक्ष नगरी काशी के वृद्धाश्रम की कहानी यहां रह रहीं माताएं खुद सुना रही हैं..।
दुर्गाकुंड स्थित राजकीय वृद्ध एवं अशक्त गृह महिला वृद्धाश्रम वृद्घ एवं अशक्त गृह महिला वृद्घाश्रम इसकी स्थापना 1959 में हुई इसके वर्तमान अध्यक्ष देवशरण सिंह है। बताते हैं कि इस वक्त यहां 24 बूढ़ी महिलाएं हैं। यह सभी देश के अलग-अलग राज्यों से आई हैं।
देवशरण बताते हैं कि वृद्धाश्रम उन वरिष्ठ नागरिकों के लिए है जो निराश्रित है, जिनका कोई सहारा नहीं। कुछ माताएं ऐसी भी हैं जो घर से प्रताड़ित हो खुद ही यहां चली आईं। कुछ परिवार वाले हैं जो घर की बुजुर्ग को यहां छोड़ जाते हैं। कुछ को पुलिस यहां पहुंचा जाती है। वहीं आश्रम में रह रहीं इंद्रजीत कौर बताती हैं कि हर रोज उनके दिन की शुरूआत सुबह चार बजे से भोले नाथ की आराधना से होती है।