घंटे भर के अंदर बच्चे को ऑपरेशन थिएटर में शिफ्ट कर दिया गया। दो घंटे तक चले ऑपरेशन के बाद प्रांजल की जान बच गई। ऑपरेशन के बाद प्रांजल के पिता श्याम कुमार ने कहा कि चार बेटियों के बाद यह बेटा हुआ था। हमने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी लेकिन यहां के चिकित्सकों ने भगवान की भूमिका निभाई और मेरे बेटे को बचा लिया।
बीएचयू ट्रॉमा सेंटर के इंचार्ज प्रो. सौरभ सिंह ने बताया कि बच्चे के इलाज के लिए कोई भी खर्च परिजनों से नहीं लिया गया है। ट्रॉमा सेंटर में ऑपरेशन की पूरी व्यवस्था होने के कारण बच्चे की जान बच गई है।
बाल शल्य रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. वैभव पांडेय ने बताया कि सरिया पेट के आरपार होने के कारण पेट फट गया था।
ऐसी स्थिति में बहुत कम ही संभावना होती है बचने की। छोटी आंत में 10 जगहों पर छेद हो गया था। सरिया किडनी के रास्ते बायें पैर को जोड़ने वाली धमनी के बाहर निकल गई थी। ऑपरेशन के दौरान छोटी आंत का 40 सेंटीमीटर हिस्सा काटकर निकालने के बाद उसे जोड़ा गया। ओटी में उपलब्ध एडवांस वेसेल सीलर मशीन बच्चे की जान बचाने में काफी मददगार हुई थी।
ऑपरेशन के लिए दवाएं, उपकरण या अन्य सामग्री व पैसा जमा कराने के झंझट व भाग दौड़ नहीं करनी पड़ी। सारी सुविधाएं प्रभारी के निर्देश पर अस्पताल की ओर से ही मुहैया कराई गई। इससे समय की बचत हुई। ऑपरेशन में डॉ. सुनील, डॉ. रजत, डॉ. सेठ, डॉ. मंजरी मिश्रा, डॉ. आमीर, डॉ. अनुईया आदि शामिल थीं।