ये बीमारियां अक्सर खून में खतरनाक थक्के बनने की वजह से होती है। ये नसों को अवरुद्ध कर जान के लिए खतरा बन जाते हैं। भारत में वेनस थ्रॉम्बो एम्बोलिज्म की वार्षिक दर हर 1,000 लोगों पर 1-2 ही है, जबकि पल्मोनरी एंबोलिज्म के मामले हर एक लाख पर 39-115 और डीप वेन थ्रॉम्बोसिस के मामले 53-162 प्रति लाख तक दर्ज किए गए हैं।
आम तौर पर इन रोगों से बचने के लिए रक्त को पतला करने वाली पारंपरिक दवा दी जाती है। वारफारिन और हेपरिन धक्कों के इलाज या रोकथाम में इस्तेमाल होती हैं। इनके कई दुष्प्रभाव भी देखे जाते हैं। इसी तरह लैब में खून के नमूने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले केमिकल से इंडीटीए और सोडियम साइट्रेट समय के साथ रक्त कोशिकाओं की संरचना को प्रभावित करते हैं। इससे जांच की सटीकता पर असर पड़ता है। डॉ. सुदीप मुखर्जी ने बताया कि यह नैनो मैटेरियल रक्त संबंधी रोगों की रोकथाम और निदान के लिए एक सुरक्षित और अधिक प्रभावी विकल्प देता है।