गंगा के पावन तट पर मंगलवार की शाम शास्त्रीय रागों, आलापों के साथ ही पारंपरिक लोक धुनों से परवान चढ़ी।
जानी मानी शास्त्रीय गायिका बेगम परवीन सुल्ताना ने शास्त्रीय बंदिश को कठिन राग पूरिया धनाश्री में निबद्ध किया तो ठुमरी के अंदाज में फिल्मी नगमा उतार कर नई पीढ़ी के मन की गहराइयों को छूने की कोशिश की।
फिल्म -कुदरत के गीत- हमें तुमसे प्यार कितना ए हम नहीं जानते/मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना... की प्रस्तुति से गंगा महोत्सव का आखिरी संगीत निशा को ऊंचाई दी। कुचिपुड़ी नृत्य में जहां पारंपरिक भावों के साथ ही शास्त्रीय पुट साकार हुए, वहीं सितार के तारों के साथ लोगों का तन-मन भी खूब झंकृत हुआ।
इसी के साथ संत रविदास घाट पर सुर,लय, ताल के तीन दिनी संगम पर आधारित गंगा महोत्सव ने विराम ले लिया।
सूबे के राज्यपाल राम नाईक की मौजूदगी में गंगा महोत्सव की आखिरी निशा को गति मिली। रामनाईक ने काशी की संगीत परंपरा की सराहना की।
भव्य मुक्ताकाशीय मंच पर शुरुआत युवा सितार वादक निलाद्री कुमार ने राग श्री की अवतारणा से की। उन्होंने छोटा सा अलाप बजाने के बाद ही विदा ले लिया। तबले पर उनके साथ संगत की शुभ महाराज ने।
इनके बाद उप शास्त्रीय गायिका मालिनी अवस्थी ने माइक संभाला। गंगा और बाबा विश्वनाथ को नमन करने के बाद मालिनी ने दादरा, ठुमरी, कजरी के अलावा पारंपरिक लोक गीतों से अपनी छाप छोड़ी।
ठुमरी के बोल- नदिया धीरे बहो मोरे सैंया जी उतरेंगे पार... की उनकी प्रस्तुति पर लोग झूमने लगे। कजरी के बोल-सेजिया पर लोटे काला नाग हो/ सवनवां में ना जइबे ननदी...के अलावा उन्होंने एक से एक गीतों की प्रस्तुति की।
आखिर में सूबे के पर्यटन मंत्री ओम प्रकाश सिंह ने एक पारंपरिक गीत की फरमाइश की। बोल थे- सइंया मिलल लरिकइयवा मैं क्या करूं/सोलह बरस की जब मैं होने को आई/सइयां छुड़ावें मोसे पइयां मैं क्या करूं... के बोल पर खूब तालियों के शोर गूंजे और सीटियां बजने लगीं।
मंत्री ने मलिनी को स्मृति चिह्न देते समय इस फरमाइश के पीछे की वजह का भी जिक्र किया। कहा कि बीएचयू के कुछ छात्रों ने यही गीत गवाने के लिए उन पर दबाव बनाया था।
इनके बाद पटियाला घराने की गायिका बेगम परवीन सुल्ताना ने राग पूरिया धनाश्री में अलापचारी की। तीन ताल में निबद्ध बंदिश के बोल थे- लागी लगन तोसे...।
फिर द्रुत लय में पायलिया झनकार मोरि...की प्रस्तुति से उन्होंने संगीत प्रेमियों को गमक और मिठास से परिचित कराया।
इसके बाद फिल्म कुदरत के गीत- हमें तुमसे प्यार कितना... को ठुमरी के अंदाज में सुरों से सजाकर उन्होंने तलियां बटोरीं।
तबले पर मिथिलेश झा और हारमोनियम पर विनय ने संगत की। इनके बाद दिल्ली से आए डॉ. राजा-राधा रेड्डी की टीम ने कुचिपुड़ी नृत्य से समा बांधा। कलाकारों को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया।