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अनोखी होलिकाएं: काशी में कोई गंगा से पुरानी तो कोई 14वीं शताब्दी की है होलिका, पढ़ें- रोचक किस्से

Sun, 24 Mar 2024 05:40 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

काशी में अनोखी होलिकाएं आकर्षण का केंद्र बनी हैं। शहर में कहीं 14 फीट की होलिका तो कहीं ढाई फीट की होलिका सजाई गई हैं। इस बार शहर में कई स्थानों पर उपले पर होलिका सजाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही हैं।
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Holi 2024 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अड़भंगी शिव की नगरी काशी की होलिकाएं और अंदाज भी अनोखा है। कोई होलिका तो गंगा से पुरानी है तो कोई 14वीं शताब्दी से भी अधिक पुरानी हैं। शहर से लेकर गांव तक ढाई हजार से अधिक होलिकाएं सजाई गई हैं। इस बार कहीं 14 फीट की होलिका सजी है तो कहीं ढाई फीट की। इस बार शहर में कई स्थानों पर उपले पर होलिका सजाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही हैं। गंगा घाट से लेकर वरुणा पार हर मोहल्ले, चौराहे और गलियों में होलिका दहन की परंपरा निभाई जाती है।

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कचौड़ी गली में रखी गई थी पहली प्रतिमा
शीतलाघाट की होलिका गंगा से भी प्राचीन मानी जाती है वहीं कचौड़ी गली की होलिका 14वीं शताब्दी से जलती आ रही है। कचौड़ी गली के निवासी मदनलाल यादव ने बताया कि कचौड़ी गली के नुक्कड़ पर जलने वाली होलिका का इतिहास 14वीं शताब्दी से है। होलिका माता व प्रह्लाद की मूर्ति सबसे पहले कचौड़ी गली त्रिमुहानी पर स्थापित की गई थी। काशी में यहीं से होलिका में पहली प्रतिमा रखने की शुरूआत हुई। मोहल्ले वालों के घर से लकड़ियों व कंडे के अंशदान से होलिका सजती है।

शीतलाघाट पर जलती है पहली होलिका

बात करें होलिकाओं की तो काशी में सबसे पहली होलिका शीतला घाट पर जलाई गई थी। काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि जब काशी में गंगा नहीं थी तो यहां पर रुद्र सरोवर हुआ करता था। उस दौर से यहां पर होलिका दहन हो रहा है। पुराणों के अनुसार शीतला घाट पर जलने वाली होलिका का इतिहास सबसे अधिक प्राचीन है। मान्यता के अनुसार सबसे पहले होलिका में आग शीतला घाट पर ही लगाई जाती थी। आदितीर्थ मणिकर्णिका पर होलिका दहन का इतिहास भी प्राचीन है। एक तरफ जहां चिताएं जलती हैं तो वहीं दूसरी ओर होलिका दहन भी होता है।

होलिका दहन पर बंटती थी रंगों की पुड़िया
अस्सी घाट पर होलिका दहन की परंपरा एकदम अनूठी है। जगन्नाथ मंदिर के पास जलने वाली होलिका का अपना अलग इतिहास है। अस्सी निवासी राधेकृष्ण पाठक ने बताया कि होलिका दहन के बाद बच्चों को रंगों की पुड़िया व मिठाइयां बांटी जाती थी। पुरनियों से हम लोगों ने सुना था कि होलिका की तिजहरिया से ही नगाड़ों का जुलूस चंदा मांगने निकल पड़ता था। अब यह परंपरा नाममात्र की ही बची है।

पेशवाओं से पहले से जल रही है भदैनी में होलिका
भदैनी की होलिका और होली का रंग तो पेशवाओं के कालखंड से पहले का है। पेशवाओं के आने से पहले ही यहां पर होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है। होलिका में दही, रंग-हांडी फोड़ने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है। भदैनी निवासी प्रताप बहादुर सिंह ने बताया कि पेशवाओं के काल से पहले से होलिका दहन की परंपरा आज तक कायम है। समय के साथ दही हांडी फोड़ने की परंपरा जुड़ी है।
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ढुंढिराज पर जलती है होलिका

बाबा विश्वनाथ के प्रवेश द्वार पर विराजमान ढुंढिराज गणेश के सामने जलाने वाली होलिका का भी प्रमाण पुराणों में मिलता है। काशी विद्वत परिषद के महामंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि बाबा विश्वनाथ के प्रथम द्वार ढुंढिराज गणेश की हाेलिका में अन्नदान की परंपरा है। लकड़ी व कंडे के साथ नवान्न डाला जाता है।

पांडेयपुर में लोकतंत्र की थीम पर होलिका प्रतिमा सजाई गई है। 10 फीट की होलिका प्रतिमा के सामने चार द्वारपाल की मूर्ति भी लगाई गई है। वहीं पियरी में 14 फीट की होलिका, चेतगंज में 10 फीट की तो हबीबपुरा में ढाई फीट की होलिका की प्रतिमा सजाई गई है।

चेतगंज में होलिका की प्रतिमा आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। लाल साड़ी में अनूठी मुद्रा वाली इस प्रतिमा के साथ भक्तराज प्रहलाद सुशोभित हो रहे हैं। होलिका दहन में गाय के कंडे (उपले) के इस्तेमाल का किया गया है। गोदौलिया बड़ादेव मंदिर परिसर के अंदर अरंडी और गूलर के पेड़ की लकड़ी पर भक्त प्रह्लाद के साथ होलिका की मूर्ति स्थापित की गई है।
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